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2122 121 122 22
इन
हवाओं को आज
बता
दो यारों
आँधियों में चिराग़ जला दो यारों
बात
करते बहुत क़िस्मत की,उनको
कुछ
हुनर का,कमाल दिखा दो यारों
जो करें भेदभाव, अगर मानव में
मज़हबी वह दिवार, गिरा दो यारों
रौशनी की बहार, चले गुलशन में
प्यार
के फूल-पात खिला दो यारों,
[11:09 AM, 9/3/2019] वैभव बेख़बर:
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तीर
नज़र ना ही खंज़र से
पत्थर टूटेगा पत्थर से
दरिया
पर रौब जमाते हैं
डरते हैं लोग समुंदर से
चहरे
पर मुस्कान लिए
हैं
पर
घायल हैं सब अंदर से
बंज़र होने से बच जाती
गर
होती बारिश अम्बर से
दूरी न घटे , बैठे बैठे
मन्ज़िल
होती पास सफर से
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वैभव
बेख़बर:
ग़ज़ल
करता है मुझको पानी पानी
जब
जब आंखों से बहता पानी,
शायद
जाम ज़हर का ,ना पीता
गर
प्यासे को मिल जाता
पानी
गन्दे, ताल-नदी, और कुँए सब
अब बोतल में बिकता है पानी
इस बस्ती से बादल उठ्ठे थे
जाकर
दूर कहीं बरसा है पानी
आग लगाकर अपने जंगल में
ढूंढ रहा है मंगल में पानी।
वैभव
बेख़बर
[4]
:
वज़्न 22
22
22 22
वैभव
बेख़बर
राज कई फिर से ,खुल जाते
सच
के साथ अगर तुम आते
पाले हैं आंखों में जुगनू
फ़िरते सबको चाँद बताते
कम
हो जाता,भार सभी का
इक दूजे का हाथ बटाते
भूख
अगर, हमको न सताती
घर से इतनी दूर न आते
सबको,सबका हिस्सा,मिलता
गर,मेहनत कर, लोग कमाते
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आवाज़ सच्ची सदा उठाते रहो
तुम
झूठ को आइना दिखाते रहो
पत्थर,बड़े से बड़ा,बिखर जाएगा
बस
चोंट,खाते रहो, खिलाते रहो
इक
दिन,निशाना,सही लगेगा कभी
तुम
कोशिशें ,सिर्फ दोहराते रहो
हो ,जाएगा दूर, हर अँधेरा यहाँ
बस
हौसलों में
हुनर,जलाते रहो
सारा,जहां फिर,चमक उठेगा यहाँ
मिलकर
दिये, से दीया जलाते रहो
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22 22 22 122
वैभव
बेख़बर
कोई और न,दिलपर सितम कर
मेरे मालिक मुझपर रहम कर
तकलीफ़ रही हैं बढ़ हमारी
थोड़ी
सी,मुश्किल आज कम कर
अश्क़
बहाऊँ, कब तक ज़मीं पर
हो जाये, बरसात मौसम कर
महिमा, तेरी सब ने सुनी है
जलते
शोंले आज शबनम कर
झूठ कभी ,सच बन ना ,सकेगा
मेरा सर चाहे तू , क़लम कर।
7
वैभव
बेख़बर
कुछ चोंट सफर में खाये हम
उनसे मिलने जब आये हम
इश्क़ यहाँ आसान नहीं है
सब
खोये ,तब कुछ पाये हम
कांटों
पर, चलना ,मुश्किल था
कल ,वो राह, गुज़र आये हम
हाँथ हुनर से, खाली निकला
बद-क़िस्मत के हैं , जाये हम
बर्बाद
किया, इश्क़ में खुद को
तब ,दर्दे-दिल ,लिख पाये हम
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अब
नदी, ना कुएं से, ये आब ला
जा ,किसी मयकदे से शराब ला
आब=पानी
आज मेरी ,अना का सवाल है
ढूंढ
कर, तू कहीं से ज़बाब ला
कुछ हुनर का वज़ूद पता चले
अब समन्दर में एक सैलाब ला
मन्ज़िल
,कहाँ गयी छूट हमसे
देखना
है, सफ़र का हिसाब ला
सब सजा
दूं, हक़ीक़त की तरह
मेरि आंखों में अपने ख़्वाब ला
डगमगाने
, लगें हैं पाँव अब
ज़िन्दगी और, दर्द अज़ाब ला।
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नक़ाब
,हटा ,अपने गुमान से
धूप आने दे, रौशनदान से,
निशाने
पर ,जब वो आता है
तीर,निकलता नहीं कमान से
मां
केसाथ,वो बचपन के पल
ख़ूबसूरत
थे, दोनो जहान से
हवाओं
पर कोई ज़ोर नहीं है
औरवो
लड़ना चाहे तूफान से
मन्ज़िल
क्या, मिले क़ायनात
गर
कोशिश हो, दिलोजान से
उड़नेवालों
की तरह,गिरे नहीं
जो
हुनर ,चढ़ेगा पायदान से।
10
बह्र 122 122 122 122
वैभव
बेख़बर
सियासत, के सच्चे , हवालों, ने लूटा
अँधेरों
, से ज़्यादा, उजालों ने लूटा
सभी घूस खाते, हैं दफ़्तर ,के बाबू
अगर
बच, गया तो, दलालों ,ने लूटा
हरेक मसला,मज़हबी कर दिया,फिर
वतन
को, वतन के, बवालों , ने लूटा
निग़ाहों,को मन्ज़िल,नज़र आ,गयी जब
हमें पाँव के सुर्ख़ छालों ने लूटा।
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सुबह,दोपहरी,यहां हर शाम ठहरे
लवों
पर आकर,तुम्हारा नाम ठहरे
कसूर,सफ़र में,तुम्हारा भी बहुत है
मुहब्बत
में,हम अगर बदनाम ठहरे
छलक
जाता है, मिरे छूने से पहले
अगर
आँखों में, सुनहरा जाम ठहरे
मुहब्बत
के,खेल में, आ तो गए हैं
फ़रेबी
अक्सर यहाँ नाक़ाम ठहरे
तुम्हारे
जैसा नहीं आया
नज़र
तक
मेरी
आँखों में, हसीन तमाम ठहरे।
12
वैभव
बेख़बर
इस
क़दर हम लाचार हो गए
फूल
सब के सब,ख़ार हो गए
क़ैद
होगा, अब बे-गुनाह ही
सब गुनहगार ,फ़रार हो गए
इक
दफ़ा,हमको बोलना पड़ा
झूठ और , तलबगार हो गए
डॉक्टर
थे, हम, गांव गांव के
शह्र आकर, बीमार हो गए
छोड़ ,गैरों ने, रास्ता दिया
लोग, अपने दीवार हो गए
हो
रहा है, अब प्यार आपको
जिस्म, जां ,जब बाज़ार हो गए।
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जो,आपस में, उलझन रहती है
थोड़ी थोड़ी सबकी गलती है
होती जाती, रोज बुरी,दुनिया
जाने
किस ,रस्ते पर चलती है
वक़्त,वही दिन को भी मिलता है
रात यहाँ उतनी ही, पलती है
भरता
है, गागर में सागर ,जब
आग
तभी ,पानी में लगती है
मतलब,धन-दौलत की,दुनियां में
सब
गाज, वफ़ा पर ही, गिरती है
14
:
उजालों का, ख़याल ख़्वाब कौन दे
तिरी आंखों में, आफ़ताब कौन दे
सभी
नें, झूठ बे-हिसाब कर लिए
मग़र सच का यहाँ ,हिसाब कौन दे
सियासत, जब अमीर लोग ले गए
ग़रीबी, मर रही, ज़बाब कौन दे
समन्दर में, सब बादल ,बरस गए
हुई बन्जर ज़मीन, आब कौन दे
छिड़ी है, ज़ंग पेट के लिए यहां
बनाकर आपको क़बाब कौन दे
15
:
मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन
वैभव
बेख़बर
अँधेरी रात , रौशन है, हुआ क्या है
दिया
कोई नहीं था,फिर ,जला क्या है
बिता दी उम्र सारी, कैद में उनकी
मग़र
मालुम नहीं,हमको,ख़ता क्या है
ज़माना
हो,रहा अब,दिन-ब-दिन,बदतर
बताओ आप ही अच्छा, बुरा क्या है
बग़ैरत
है ,लगी जो, होड़,मज़हब की
नहीं जाने, यहाँ कोई , ख़ुदा, क्या है
मिटा दूं, दूरियां, मालुम ,करो पहले
हमारे बीच ,कितना ,फ़ासला क्या है।
16
वैभव
बेख़बर
दिया सहारा आँचल जैसा
ज़हन
हुआ जब घायल जैसा
लगी,ज़मीं जब तपने दिलकी
बरस
, गया वो , बादल जैसा
शहर, वहाँ जाने से , पहले
हरा भरा था, जंगल जैसा
बधा, है दिल क्या,उन पैरों में
धड़क रहा जो ,पायल जैसा
नज़र
ने ,देखा उनको जबसे
ज़िगर
हुआ है, पागल जैसा|
17
:
आपका
गुमां कुछ नहीं
ज़िन्दगी ये जां कुछ नहीं
सिर्फ सिर्फ़ नुकसान है
और
यह दुकां कुछ नहीं
दर्द तो बहुत है मगर
ज़ख़्म का निशां कुछ नहीं
प्यार आपसी गर नहीं
घर यहाँ, मकां कुछ नहीं
है महज़ इशारे नज़र
इश्क़ की , ज़ुबां कुछ नहीं
दूरियां
बहुत थीं कभी
आज दरमियां कुछ नहीं