वैभव बेख़बर फ़ितूर (ग़ज़ल) कवि वैभव बेखबर ,कविता ,गीत ,ग़ज़ल,कानपुर geet ,gazal,vaibhav katiyar,kanpur
सोमवार, 18 मई 2020
पानी और प्यास ( वैभव बेख़बर )
मेरा नाम गुलशन है और मैं बाल्मिकी समाज से आता हूँ,यानि (भंगी),
मुझे भंगी कुल में पैदा होने का कोई दुख नहीं है,हालाकि लोग भंगी शब्द का इस्तेमाल एक गाली के रूप में करते हैं,
पहले मैं अपने गाँव के लोगों का मैला उठाता था,ये कार्य मुझे अपने पूर्वजों से मिला , लेकिन वर्तमान में गांव के सभी घरों में शौचालय बन गए हैं, गरीबों के शौचालय सरकार के द्वारा बनाएं गए हैं, अच्छा हुआ।
पिछले कुछ वर्षों से मैं पास के शहर में आकर किराए पर रहने लगा हूँ,
यहीं मज़दूरी करता हूँ,साल में एक दो दफ़ा अपने गांव जाता हूँ,
इस बार जब मैं गर्मियों में अपने गांव आया,तो पीने के पानी की समस्या ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया, मेरे घर के पास जो सरकारी नल था उसका पानी सूख चुका था,कुएं सूखे पड़े थे जिनमे पानी था वो बहुत गन्दे थे, मुझे गांव के दूसरे छोर पर नल से पानी लेने जाना पड़ता था,
हमारा गाँव भी भारतीय सभ्यता का एक उदाहरण है,गांव में विभिन्न जाति समुदायों के अपने अपने टोले बटे हुए हैं, अमीर-गरीब हर प्रकार लोग रहते हैं,लगभग 30% लोग बहुत सम्पन्न हैं जिन्होंने अपने घर के अंदर नल लगवा रख्खा है,गाँव में सरकार की योजना के तहत 50%लोगों ने अपने घर के बाहर नलकूप लगवा रख्खे हैं,सरकार का नियम था जो भी नलकूप लगवायेगा,उसको चौथाई कीमत देनी होगी और नल घर के बाहर ही लगेगा,जिससे मुहल्ले के लोग भी पानी भर सकें, लेकिन लोग उस नल में भी ताला डालने लगे, कुछ नें बाहर से ही दीवार बनाकर नल को घर के अंदर कर लिया, गाँव में ग़रीब-मज़दूर आदमी पीने के पानी के लिए परेशान हैं, गाँव के ज़मीदारों ने गाँव के बाहर अपने खेतों में सिचाई के लिए ट्यूबवेल लगा रखें हैं ,जिसकी वज़ह से पानी का स्तर और गिर गया है, सरकारी नलों के सूखने की वज़ह ये ट्यूबवेल ही हैं,
क्या धरती के अंदर जो पानी है उस पर सिर्फ़ धनी वर्ग का अधिकार है
गाँव के गरीब-मज़दूर या छोटे किसान अपने लिए पानी की व्यवस्था कैसे करें।
रविवार, 3 मई 2020
एक चित्र मनुष्य की सभ्यता का। (वैभव बेख़बर) कविता
बात थोड़ी नहीं , आज सारी करो
क्या ग़लत,क्या सही फ़र्क जारी करो,
अब न होगा,रवायत का ज़ुल्मों सितम
बेवज़ह लड़ लिए,ख़ूब आपस में हम,
मुल्क़ की चाहते हैं तरक़्क़ी सभी
और मत अब सियासत करो मज़हबी,
ना हो पैदाइशी कोई छोटा- बड़ा
आदमी के लिए आदमी हो खड़ा,
आशियाँ, मस्लहत में न तक़सीम हो
बाग में सेब हो, आम हो ,नीम हो,
बात दैरो-हरम की बहुत हो चुकी
बोझ ग़ुरबत का दुनियाँ बहुत ढो चुकी,
ज़ुल्म अब ना कोई भी सहा जाएगा
जो ग़लत है, ग़लत ही कहा जाएगा,
और कोई न अब होशियारी करो
क्या ग़लत, क्या सही, फ़र्क जारी करो।
भेदभाव, जाति-धर्म के शिकारी सुनों
मौलवी, पादरी, सब पुजारी सुनों
घूसखोर कर्मचारी सभी अधिकारी सुनों
शोषण करने वाली हर तज़ुर्बेकारी सुनों
दलालों सुनों , चाटुकारों सुनों
पूँजीवादी व्यवस्था के बाजारों सुनों
पाखण्ड फैलाने वाले आकाओं सुनों
संसद जाने वाले सब नेताओं सुनों,
लाखों गरीबों के सर पे कफ़न रख दिया
तुमनें ही बर्बाद करके वतन रख दिया।
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ग़रीबी, बेकारी, असभ्यता, बदहाली
पहले भी थी और आज भी है,
शोषण,दमन,अत्याचार, बल्तकार
पहले भी था , और आज भी है,
छुआछूत,भेदभाव,साहूकार,ज़मीदार
पहले भी थे, और आज भी हैं,
हर गाँव शहर में एक हरिजन बस्ती
पहले भी थी ,और आज भी है,
क्या बदला है, कुछ नहीं, हाँ बदला है
सरकारें, चुनाव ,कानून, संविधान
अदालतें, बाज़ार, कारोबार.............,
ये सब बनाये गए थे अच्छे समाज के
निमार्ण के लिए, मग़र अफ़सोस
सब के सब बुरे और बिकाऊ हो गए,
सहूलियत बदली है, सलीके बदले हैं
ताकि कुछ बदल न सके।
@ वैभव बेख़बर
पहले भी थी और आज भी है,
शोषण,दमन,अत्याचार, बल्तकार
पहले भी था , और आज भी है,
छुआछूत,भेदभाव,साहूकार,ज़मीदार
पहले भी थे, और आज भी हैं,
हर गाँव शहर में एक हरिजन बस्ती
पहले भी थी ,और आज भी है,
क्या बदला है, कुछ नहीं, हाँ बदला है
सरकारें, चुनाव ,कानून, संविधान
अदालतें, बाज़ार, कारोबार.............,
ये सब बनाये गए थे अच्छे समाज के
निमार्ण के लिए, मग़र अफ़सोस
सब के सब बुरे और बिकाऊ हो गए,
सहूलियत बदली है, सलीके बदले हैं
ताकि कुछ बदल न सके।
@ वैभव बेख़बर
राजा और प्रजा ( वैभव बेख़बर )
हर सदी में हर सरकार में मज़लूम और ग़रीब ही सियासत और सत्ता का चारा बना है, जिसके वोट से,जिसकी पीठ पर पैर रखकर सरकारें बनती हैं, गिरतीं हैं
हर सियासी पार्टी ने इस तबके का सिर्फ़ इस्तेमाल किया है
समता भाईचारे के नाम पर मुट्ठी भर लोग ही शिक्षित और समृद्ध हुए हैं,
देश की आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी समाज की खाइयाँ नहीं भरी, ग़रीब और ग़रीब हुआ है
सही और ग़लत को जानते हुए भी लोग चुप रहते हैं
हज़ार आदमी में एक ही आदमी ऐसा होता है जो झूठ को झूठ कह सके,सच को सच कहने की हिम्मत करता है, तो आप ही बताओ कैसे होगा ग़रीब तबक़े का विकास।
भूखा व्यक्ति समाज़ में कोई बदलाव नहीं ला सकता,और जिन्होंने अपनी भूख की व्यवस्था कर ली है उन्हें समाज से कुछ मतलब नहीं है कुछ मुठ्ठी भर लोग जो व्यवसाय या छोटी-मोठी नौकरियां पा गये हैं वो इतने से ही सन्तुष्ट हैं कि वो और उनके बच्चों का जीवन तो इतने से ही कट जाएगा, क्या करना समाज़,न्याय और एकता की बातें करके,
और एक तबक़ा इतना नीचे गिरा हुआ कि वह बौध्दिक स्तर पर सोच ही नहीं सकता, वह रोटी के लिए बेबस है
सरकारें उस तबक़े को अपनी योजनाओं से शिकार करती है
कभी 1000/2000 रुपये खाते में देकर, कभी 5 किलो राशन देकर,कभी मनरेगा में काम देकर...इत्यादि
यह तबक़ा इतने में ही ख़ुश रहता है
हर सियासी पार्टी ने इस तबके का सिर्फ़ इस्तेमाल किया है
समता भाईचारे के नाम पर मुट्ठी भर लोग ही शिक्षित और समृद्ध हुए हैं,
देश की आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी समाज की खाइयाँ नहीं भरी, ग़रीब और ग़रीब हुआ है
सही और ग़लत को जानते हुए भी लोग चुप रहते हैं
हज़ार आदमी में एक ही आदमी ऐसा होता है जो झूठ को झूठ कह सके,सच को सच कहने की हिम्मत करता है, तो आप ही बताओ कैसे होगा ग़रीब तबक़े का विकास।
भूखा व्यक्ति समाज़ में कोई बदलाव नहीं ला सकता,और जिन्होंने अपनी भूख की व्यवस्था कर ली है उन्हें समाज से कुछ मतलब नहीं है कुछ मुठ्ठी भर लोग जो व्यवसाय या छोटी-मोठी नौकरियां पा गये हैं वो इतने से ही सन्तुष्ट हैं कि वो और उनके बच्चों का जीवन तो इतने से ही कट जाएगा, क्या करना समाज़,न्याय और एकता की बातें करके,
और एक तबक़ा इतना नीचे गिरा हुआ कि वह बौध्दिक स्तर पर सोच ही नहीं सकता, वह रोटी के लिए बेबस है
सरकारें उस तबक़े को अपनी योजनाओं से शिकार करती है
कभी 1000/2000 रुपये खाते में देकर, कभी 5 किलो राशन देकर,कभी मनरेगा में काम देकर...इत्यादि
यह तबक़ा इतने में ही ख़ुश रहता है
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