बात थोड़ी नहीं , आज सारी करो
क्या ग़लत,क्या सही फ़र्क जारी करो,
अब न होगा,रवायत का ज़ुल्मों सितम
बेवज़ह लड़ लिए,ख़ूब आपस में हम,
मुल्क़ की चाहते हैं तरक़्क़ी सभी
और मत अब सियासत करो मज़हबी,
ना हो पैदाइशी कोई छोटा- बड़ा
आदमी के लिए आदमी हो खड़ा,
आशियाँ, मस्लहत में न तक़सीम हो
बाग में सेब हो, आम हो ,नीम हो,
बात दैरो-हरम की बहुत हो चुकी
बोझ ग़ुरबत का दुनियाँ बहुत ढो चुकी,
ज़ुल्म अब ना कोई भी सहा जाएगा
जो ग़लत है, ग़लत ही कहा जाएगा,
और कोई न अब होशियारी करो
क्या ग़लत, क्या सही, फ़र्क जारी करो।
भेदभाव, जाति-धर्म के शिकारी सुनों
मौलवी, पादरी, सब पुजारी सुनों
घूसखोर कर्मचारी सभी अधिकारी सुनों
शोषण करने वाली हर तज़ुर्बेकारी सुनों
दलालों सुनों , चाटुकारों सुनों
पूँजीवादी व्यवस्था के बाजारों सुनों
पाखण्ड फैलाने वाले आकाओं सुनों
संसद जाने वाले सब नेताओं सुनों,
लाखों गरीबों के सर पे कफ़न रख दिया
तुमनें ही बर्बाद करके वतन रख दिया।
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ग़रीबी, बेकारी, असभ्यता, बदहाली
पहले भी थी और आज भी है,
शोषण,दमन,अत्याचार, बल्तकार
पहले भी था , और आज भी है,
छुआछूत,भेदभाव,साहूकार,ज़मीदार
पहले भी थे, और आज भी हैं,
हर गाँव शहर में एक हरिजन बस्ती
पहले भी थी ,और आज भी है,
क्या बदला है, कुछ नहीं, हाँ बदला है
सरकारें, चुनाव ,कानून, संविधान
अदालतें, बाज़ार, कारोबार.............,
ये सब बनाये गए थे अच्छे समाज के
निमार्ण के लिए, मग़र अफ़सोस
सब के सब बुरे और बिकाऊ हो गए,
सहूलियत बदली है, सलीके बदले हैं
ताकि कुछ बदल न सके।
@ वैभव बेख़बर
पहले भी थी और आज भी है,
शोषण,दमन,अत्याचार, बल्तकार
पहले भी था , और आज भी है,
छुआछूत,भेदभाव,साहूकार,ज़मीदार
पहले भी थे, और आज भी हैं,
हर गाँव शहर में एक हरिजन बस्ती
पहले भी थी ,और आज भी है,
क्या बदला है, कुछ नहीं, हाँ बदला है
सरकारें, चुनाव ,कानून, संविधान
अदालतें, बाज़ार, कारोबार.............,
ये सब बनाये गए थे अच्छे समाज के
निमार्ण के लिए, मग़र अफ़सोस
सब के सब बुरे और बिकाऊ हो गए,
सहूलियत बदली है, सलीके बदले हैं
ताकि कुछ बदल न सके।
@ वैभव बेख़बर
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