रविवार, 3 मई 2020

राजा और प्रजा ( वैभव बेख़बर )

हर सदी में  हर सरकार में  मज़लूम और ग़रीब ही सियासत और सत्ता का चारा बना है, जिसके वोट से,जिसकी पीठ पर पैर रखकर सरकारें बनती हैं, गिरतीं हैं
हर सियासी पार्टी ने इस तबके का सिर्फ़ इस्तेमाल किया है
समता भाईचारे के नाम पर मुट्ठी भर लोग ही शिक्षित और समृद्ध हुए हैं,
देश की आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी समाज की खाइयाँ नहीं भरी, ग़रीब और ग़रीब हुआ है
सही और ग़लत को जानते हुए भी लोग चुप रहते हैं
हज़ार आदमी में एक ही आदमी ऐसा होता है जो झूठ को झूठ कह सके,सच को सच कहने की हिम्मत करता है, तो आप ही बताओ कैसे होगा ग़रीब तबक़े का विकास।
भूखा व्यक्ति  समाज़ में कोई बदलाव नहीं ला सकता,और जिन्होंने अपनी भूख की व्यवस्था कर ली है उन्हें समाज से कुछ मतलब नहीं है कुछ मुठ्ठी भर लोग जो व्यवसाय या छोटी-मोठी नौकरियां पा गये हैं वो इतने से ही सन्तुष्ट हैं कि वो और उनके बच्चों का जीवन तो इतने से ही कट जाएगा, क्या करना समाज़,न्याय और एकता की बातें करके,
और एक तबक़ा इतना नीचे गिरा हुआ कि वह बौध्दिक स्तर पर सोच ही नहीं सकता, वह रोटी के लिए बेबस है
सरकारें उस तबक़े को अपनी योजनाओं से शिकार करती है
कभी 1000/2000 रुपये खाते में देकर, कभी 5 किलो राशन देकर,कभी मनरेगा में काम देकर...इत्यादि
यह तबक़ा  इतने में ही ख़ुश रहता है



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