1
ज़ुल्म कब तक सहेगा तुम्हारा कोई
फोड़ देगा किसी दिन, गुबारा
कोई,
एक हद तक, थमेगा ,ये
पानी यहाँ
फ़िर बहेगी ,बग़ावत
कि धारा कोई,
मज़हबी नफ़रतें मुल्क़
खा जाएगीं
जंग होगी अग़र अब
दुबारा कोई,
अब सफ़ीना, हुनर का चलेगा यहाँ
ढूँढ़िये आप जाकर
किनारा कोई,
लोग खंज़र उठाने
लगे बेख़बर
तुमने छोड़ा नहीं , और
चारा कोई।
2
देशभक्ति का प्रमाण मांगे, ये सरकार कौन है
मुल्क़ की माटी जानती है ,कि ग़द्दार कौन है,
क्यों मज़हब से ,करते
हो पहचान हमारी
जंग-ए-इतिहास, गवाह है, वफ़ादार
कौन है,
हम ज़ाहिल से पत्थर हैं, ये तो जानते हैं सब
छिपकर फूलों में ,बैठे
हैं ,वो खार
कौन है,
पूँछों वसुधैवकुटुम्बकम की
बात करने वालों से
जातिवाद, भेदभाव का
ज़िम्मेदार कौन है,
तुम्हारी अदालत का ,हर फैसला मंजूर किया
वो परवरदिगार जानता है ,गुनहगार कौन है,
दौड़े जा रहे हैं, सब दीवाने किसके दीद को
आप तो इस पार हैं, फिर
उस पार कौन है,
भीड़ पर मत जाओ, अपने
ज़हन से सोचों
कि पतवार कौन है
यहाँ, मझधार कौन है।
3
आज फ़िर , राह में,
हादसा हो गया
एक पत्ता , शज़र
से, जुदा हो
गया,
चाहने वालों ने
हमको चाहा बहुत
प्यार जिससे किया, बे-वफ़ा
हो गया,
वक़्त के हाँथ, का
खेल है ज़िन्दगी
कल तलक़,जो मिरा था,
तिरा हो गया,
पास जाते रहे, दिन-ब-दिन ,रोज़ हम
इसलिए दरमियाँ फ़ासला
हो गया,
देखता ही नहीं
अपनी सूरत कभी
आदमी किस
लिए ,आइना हो गया,
सोँचता मैं रहा,
रोज़ दीवार को
जब क़दम, चल
पड़े, रास्ता हो
गया।
4
साथ आपका अगर
मिल जाता
कंठ को , मेरे
स्वर मिल जाता,
आपकी गोद भी
सूनी ना रहती
एक लावारिस को, घर मिल
जाता,
तुम भी उड़ते,
ये अम्बर सारा
यदि मेरे सपनों को,पर
मिल जाता,
ये किस्मत,कैसे होती, आपके जैसी
माना मेहनत कर, हुनर मिल जाता,
ना मक़ाम मिला, मेरे
पावों को
जो ख्वाबों में, अक्सर
मिल जाता।
5
अब हर समुदाय
की ,यही लड़ाई
है
कि मैं कॉंग्रेसी
और तू भाजपाई
है,
ये जो हिन्दू, मुस्लिम
,सिख्ख ,ईसाई है
आपसी भाई नहीं, मज़हबी
कसाई है,
सच मज़बूर है, दो
निवालों के लिए
आजकल झूठों की, मोटी
कमाई है,
सभ्यता में,मानवता का,क़त्ल करकर के
सियासत ने कर, डाली गहरी
खाई है,
यहां अमीरों के ,ब्रेन में, कैंसर है बेख़बर
और गरीबों के
पांव फ़टी बिमाई
है।
6
हम नहीं चाँद पर
कोई घर चाहते हैं
बस उन्हें देखना, इक
नज़र चाहते हैं,
ज़ुस्तज़ू अब तुम्हारी,
हमें इस कदर
है
ज़्यों मुसाफ़िर नये,
राहबर चाहते हैं,
है तमन्ना
यही , बे-वफ़ाई करो
तुम
प्यार का उम्रभर
हम, असर चाहते
हैं,
छोड़ आए ,जहां को
उन्हीं के लिए
हम
और वो हैं
कि सारा शहर
चाहते हैं,
थाम कर,हाँथ जिनको,सिखाया थ चलना
काट लेना वही
मेरा सर चाहते
हैं,
बेवफ़ा हो गए
जब नदी
के किनारे
अब सफ़ीने हमारे
भँवर चाहते हैं,
झूठ से बैर
उनको ज़रा
सा नहीं है
कल तलक जो उधर था, इधर
चाहते हैं।
7
बढ़ाना पांव मुश्किल
है ,खड़ा तूफ़ान है
यारों
वफ़ा की राह
पर चलना, कहाँ आसान है
यारों,
वतन को लूटने का एक
धन्धा है सियासत अब
तमाशा देख कर ,इनका,
ख़ुदा हैरान है
यारों,
सभी के घर जलेंगे,जब लगेगी
आग गुलशन में
हवा के हाँथ में किसने
दिया लोबान है यारों,
ये इंटरनेट के ज़रिए, तअल्लुक
सब निभाते हैं
पड़ोसी ही पड़ोसी
से , मग़र अनजान
है यारों
हुए सब मतलबी, रिश्ते ,
ज़माना है ,फ़रेबी अब
मशीनी दौर में
मिलता, नहीं इन्सान है
यारों,
8
धन अमीरों को
सारा लुटाते रहे
तुम गरीबों को
अक्सर सताते रहे,
लोग जलते रहे, भूख
की आग में
आप पानी के , किस्से
सुनाते रहे,
की सियासत बहुत, धर्म के नाम पर
बस्तियाँ बे-वज़ह तुम
जलाते रहे,
गिर गई,स्थति आर्थिक,वतन की बहुत
आप डॉलर का
गुणगान गाते रहे,
लोग मरते रहे,
रोज़ फुटपाथ पर
क्यों करोड़ो कि,
गुम्बद बनाते रहे।
9
हाँथ लेकर हुनर
जल-जला कीजिए
दूर मन्ज़िल नहीं
हौसला कीजिए,
हो गए ज़िन्दगी
में, अँधेरे बहुत
जल सको दीप सा, तो जला
कीजिये
बेवज़ह का दिखावा, किया
मत करो
कर सको ,तो किसी का,भला कीजिए,
भेद सब, छोड़कर
आदमी से यहाँ
आदमी की, तरह
ही, मिला कीजिए,
बाग का रोज़ , नुकसान
होता बहुत
आँधियों की तरह,मत
चला कीजिए,
10
ज़ुर्म की हद
कहाँ तक सही जाएगी
बात सच की
हमेशा कही
जाएगी,
जानती जो नदी,
रास्ते का
हुनर
खुद-ब-खुद ही समन्दर, चली
जायेगी,
इश्क़ आदत में होना,
बुरी चीज़ है
और मुझसे ये आदत
नहीं जाएगी,
आपसी जंग
होती रहेगी
यहाँ
मज़हबी गर सियासत
करी जाएगी,
भूख से जब
कोई, मौत होगी
नहीं
मेरि आँखों से तब, यह
नमीं जाएगी।
11
हर तरफ़ झूठ
की आज पहचान है
बोलना सच कहाँ
इतना आसान है,
कुछ क़दम क्या चले,इक ख़ुशी के लिए
दर्द ही दर्द
दिल पर, महरबान
है
हर नज़र ,ख़्वाब
पाले हुए है
यहाँ
यह ज़माना, हक़ीक़त
से अनजान है
दिल भरोसा किसी का,करे
तो कैसे
मतलबी हो गया, आज
इन्सान है,
दौलत ख़रीद ले ऐसा मुमकिन नहीं
इतना हल्का कहाँ
मेरा ईमान है।
12
ज़माना हम बदलते
तो
ज़रा तुम साथ चलते तो,
पकड़कर छोड़ देते
बस
नहीं गिरते, सँभलते
तो,
दिये कुछ तो नया
करते
हवा के साथ जलते
तो,
कभी कुछ झूठ ही कहते
नज़र में, ख़्वाब पलते तो,
तुम्हें मन्ज़िल मिली होती
समय के साथ चलते
तो,
ग़ज़ल में, वज़्न ना
होता
हमारे ग़म पिघलते
तो।
13
दीप सा, तन जलाया , बुझाया
गया
हम गरीबों , को अक़्सर,
सताया गया,
कश्तियाँ मैं बनाता
रहा उम्रभर
इसलिये साहिलों
पर डुबाया गया,
हमने जिस पर किया था भरोसा
बहुत
बोलकर झूठ अक़्सर
रिझाया गया,
ज़ुर्म का, वह
बराबर गुनहगार था
सिर्फ़ सूली हमें
ही, चढ़ाया गया,
आपसी जंग होती
रहेगी सदा
यदि नहीं मज़हबों को
मिटाया गया।
14
हर तरफ़ ज़ुर्म की एक
सौगात होगी
मज़हबों से जहाँ
हर, शुरुआत होगी,
बुझ गया,गर यहाँ आदमीयत क सूरज
फ़िर सदी भर, बुरी
रात ही रात होगी,
दिन-ब-दिन,हो रहीं, गर्द बन्जर
ज़मीने
अब कहाँ, बादलों की,
ये बरसात होगी,
गैर मज़हब है, जिससे
मुहब्ब्त हुई है
जंग मैदान
में ही , मुलाक़ात
होगी
फ़र्श से अर्श तक, ज़िन्दगी खिल उठेगी
गर मुहब्ब्त, तुम्हारी ,मिरे
साथ होगी।
15
वफ़ाओं का अपनी करम
पा रहा हूँ
तुम्हें याद कर
के, पिये जा
रहा हूँ,
लगाता नहीं है
, यहाँ कोई
मरहम
दिले-ज़ख़्म, खुद ही, सिये
जा रहा हूँ,
क़दम चल पड़े हैं, अदम
के सफ़र में
तेरा नाम लेकर,
जिये जा रहा
हूँ,
इनायत उसी की,
उसी का रहम है
मुहब्ब्त के
नग़मे ग़ज़ल
गा रहा हूँ,
उन्हें याद करके,
सदा की तरह फिर
उन्हें भूलने की
कसम खा रहा
हूँ।
16
सिसकियों में पलीं बेटियां
बोझ समझीं गयीं बेटियां,
भाइ सा प्यार मिलता नहीं
दर्द यह भी सहें बेटियां,
काम करतीं रहें रातदिन
घर से निकलीं कहाँ बेटियां,
अपने मन से किया
कुछ अगर
रोज़ टोकीं
गयीं बेटियां,
भेद सहतीं हुईं उम्रभर
वेदना में जलीं बेटियां,
तल्खियां
तल्खियां तल्खियां
ज़िन्दगी भर सहें बेटियां।
17
हम मिटाते रहे दूरियों
को भले
ज़िन्दगी में मुसलसल, बढ़े फ़ासले,
हाँथ हमसे मिलाया नहीं आजतक
और सबको लगाते रहे वो गले,
मैं करूँ किसलिए, इतनि जद्दोजहद
जब सभी फूटने हैं, यहाँ बुलबुले,
फ़न सुख़न का,विरासत में पाया नहीं
दर्द ही ,इस क़दर ज़िन्दगी से मिले
रहबरों नें दिया ,यह सबब बेख़बर
रास्तों में
हमें हादसे ही मिले।
18
न मीठा सही ,यार ख़ारा मिलेगा
चलो और थोड़ा किनारा मिलेगा
वही फ़िर बचेगा ख़ुदा के, क़हर से
जिसे नेकियों का सहारा मिलेगा
यकीं मानिए,राह दिल की ,कठिन है
तुम्हें उलफ़्तों में,ख़ासारा मिलेगा
ज़मीं पर तुम्हें खाइयाँ ही मिलेंगीं
बढ़ो आसमाँ तक,सितारा मिलेगा
तुम्हें इस वियावान दिल में हमारे
हसीं सा, न कोई नज़ारा मिलेगा।
19
(1) दर बदर
है डगर
(6) मयकदे आप के
ज़ीस्त है वो सफ़र,
जाम दो,या ज़हर,
(2)आग से, तेज़ अब
(7)कुछ हसीं,ख़्वाब,मैं
फैल ती है
ख़बर,
देखता रात भर,
(3)सभ्यता खो रहे
(8) आइना देखना
लोग आकर शहर,
बोलती है नज़र,
(4)इश्क़ माना बुरा
(9)इश्क़ का ,है सबब
इक दफ़ा, कर मग़र,
दिल हुआ,बेख़बर।
(5)वो मिले
ना कभी
जो गये
छोड़ कर,
20
जीते देखे हारे देखे
मन्ज़र।
हमने सारे देखे
सुन लीं,सबकी बातें फिर भी
नख़रे रोज तुम्हारे देखे
कल झील सरीखी आँखों में
हमने चाँद सितारे देखे
जब रातें
बीतीं ख्वाबों में
तब तब दिन में।
तारे देखे
उसकी ग़लती पर
उसके ही
चढ़ते हमने पारे देखे
मुस्काती देखीं लैलाएँ
मजनूँ ग़म के
मारे।
देखे
सूखी सूखी
नदियों में भी
बहते जल के
धारे देखे
देखे आदम उज़ले जितने
मन से उतने कारे देखे
बैठे संसद के अन्दर ही
संसद के
हत्यारे देखे
देखा मिलना सरहद का भी
घर घर
में बटवारे देखे
बलिदानी देखी वीरों की
आज़ादी के नारे देखे
गैरों से भी बदतर निकले
अपने प्यारे न्यारे देखे
तुमनें तो मन्ज़िल देखी बस
पैरों ने अन्गारे देखे।
21
ज़िस्म की जल रही है ज़मीं बेख़बर
ना रही अश्क़ में अब नमीं बेख़बर
रात फ़िर करवटों में ,गुज़रती मिरि
आपकी जब सताती ,कमीं बेख़बर
क़त्ल कर दो मिरा, ख़ौफ़ हमको नहीं
ज़ख़्म देना नहीं, मरहमी बेख़बर
अब रहे हम न हम,क्यों रहे तुम न तुम
आसमाँ भी वही ,है ज़मीं बेख़बर
अब मिटा दीजिए, नफ़रतें मज़हबी
चैन से
जी सके, आदमी बेख़बर।
22
सफ़र में, क़दम तुम बढ़ाते रहो
भले आँसुओं
से नहाते रहो,
उजालों कि घर में ज़रूरत नहीं
दिया रोज़ दिल में, जलाते रहो,
न दौलत, केइतने दिवाने बनो
मुहब्ब्त भि थोड़ी कमाते रहो,
सुनाते हो सबको, जो बातें नईं
वही बात ख़ुद को, बताते रहो,
ये माना मुहब्ब्त के क़ाबिल नहीं
नज़र तो नज़र से मिलाते रहो,
23
मिलाना नहीं जाम में यार पानी
लगी आग दिल की, बुझाए न पानी
बता दो , उसे याद आये न इतना
बहुत बह चुका है, निगाहों से पानी
लवों की उदासी, नज़र खिल उठेगी
छिड़क दें,अगर वो, वफ़ाओं का पानी
वो चंचल अदाएँ, चिन्गारी सी लड़की
हमें देख कर, हो गयी , पानी-पानी
कभी इक ,कुआँ खोद पाया नहीं वो
चला है, सुखाने ,समन्दर का पानी।
24
कभी ना दिया डूबते को सहारा
जिसे मिल गया है ,नदी का किनारा
बड़े नेक थे दुश्मनों के इरादे
मग़र दोस्तों को हुआ ना गवारा
ज़माना उसे फिर
कहाँ रोक पाया
यहां जो , हुनर ने, मुक़द्दर सँवारा
हुआ भीड़ में, गुम गया छोड़कर जो
मिला ना,कभी कोई मुझको दुबारा
उतर आया है वो,निग़ाहों से दिल में
ज़रा देर मैंने उसे
क्या निहारा।
0
25
जाने किस राह पर चल पड़ा आदमी
दिन-ब-दिन हो रहा है बुरा आदमी
गर दिखे कोई लाचार तो काट ले
हाँथ तलवार लेकर खड़ा आदमी
हैशियत देखकर अब मुलाकात हो
कब यहाँ आदमी से मिला आदमी
बेच ईमान अपना कमाता फिरे
कुछ हुआ,इस तरह भी बड़ा आदमी
मार डाला
सताकर उसे बेख़बर
था शहर में वही इक भला आदमी।
26
मैं वादा तो नहीं करता, पुरे अरमान कर दूंगा
जहाँ तक साथ आओगे,सफ़र आसान कर दूंगा
नहीं फ़िर रोक
सकतीं, मंज़िले अपना बनाने से
हुनर अपना मुसीबत के, सरे-मैदान कर दूंगा
न दौलत है, न शौहरत है, ज़रा इज्ज़त कमाई है
तुम्हारे चाह में वो भी, यहाँ कुर्बान कर दूंगा।
27
ख़ूब पूजे गये, औ सजाए गये
देवता फिर नदी में ,बहाए गये,
झूठ वालों,पे सबने, यकीं कर लिया
लोग जो नेक थे, आजमाए गये
मन से मैले, कई और थे ,मुल्क़ में
आइने सिर्फ़ हमको ,दिखाए गए
रौशनी का हवाला, मिला इस क़दर
जो दिए जल रहे थे, बुझाए गये
पक न पाया ,कभी पेड़ पूरी तरह
पत्थरों से कई फल गिराए गये
कुछ मिला ही नहीं,नफ़रतों के सिवा
ऐसे मज़हब यहां क्यों, बनाये गए,
0
28
हादसों के शहर , हादसा हुआ
इश्क़ की राह में, और क्या हुआ
सोँचते ही रहे हम ,कि क्या हुआ
वक़्त बेवक़्त जब जब ख़फ़ा हुआ
क़ुरबतें बढ़ गईं ,खुद ब खुद कहीं
ख़ुद ब खुद ,ही कहीं फ़ासला हुआ
कोई। पत्थर नहीं ,पीठ पर मग़र
बोझ से आदमी है दबा हुआ
साथ कुछ दिन, रहे हमसफ़र कई
दिल जहाँ ,भर गया, बेवफ़ा हुआ।
29
शिकारी भूल सब जाए निशाना याद रखता है
हुनर जिसको बनाता है, ज़माना याद रखता है
नये किरदार हों ,जिसमे, ऐसी कोई कहानी लिख
यहाँ अब कौन अफ़साना, पुराना याद रखता है
मुझे सब याद हैं,उस इश्क़ के,एहसान और सितम
परिन्दा ,जिस तरह अपना, ठिकाना याद रखता है
ज़रूरत जब बुलाती है, तअल्लुक आते-जाते हैं
नहीं तो कौन किसका, आशियाना याद रखता है
30
आदमी ,आदमी से लड़ाया गया
धर्म, मसला सियासी बनाया गया,
आग की,सिर्फ़ चर्चा दिखायी गयी
घर,गरीबों का,जिसमे जलाया गया,
सच बनाकर, परोसा गया झूठ को
सामने कब,हक़ीक़त को,लाया गया
कोइ निकला गुनहगार, तफ्तीश में
और इल्ज़ाम किस पर,लगाया गया,
वक़्त अपना बिताकर चले वो गये
वक़्त मेरा मुहब्ब्त में जाया गया
31
शोख़ चंचल नई अदाओं का
वक़्त आया यहां कबाओं का,
क़त्ल तो नज़रिये से होते हैं
ज़ुर्म होता नहीं
निगाहों का
रब मेहरबान भी ,हुआ उसपर
जो शहं शाह है गुनाहों का
रोज़ लड़ना पड़ा बलाओं से
कब हुआ है असर,दुआओं का,
जो करे, सामना पहाड़ों सा
वो बदलता है रुख़,हवाओं का,
ज़ुर्म ही हो, नहीं ज़रूरी कोई
है सफ़र ,ज़िन्दगी सजाओं का,
मंज़िले आप ढूँढ़िये अपनी
मैं मुसाफ़िर हूँ, गर्द राहों का।
32
बह्र फ़ायलातुन
वज़्न= 2122 2122 2122 2122
कुछ नहीं है ,हाँथ अपने बे-बसी है और क्या
इक सफ़र है मुश्किलों का
ज़िन्दगी है और क्या,
हो गए बर्बाद हम तो दोस्ती के नाम पर
हर तरफ़ थी रहज़नी अब रहबरी है और क्या,
जैसे-तैसे कट रही है क्या बतायें हाले-दिल
दूर जबसे तुम हुए हो, बे-खुदी है और क्या,
देख मेरी हरकतें, मत गौर इतना कीजिए
प्यार में बेचैन होना लाज़िमी है और क्या,
कब तलक़ बैठे रहोगे, नूर कुछ पैदा करो
रौशनी की है कमी, तीरगी है और क्या।
33
लोग पत्थर चलाने
के आदी हुए
धर्म के नाम पर जो फ़सादी हुए,
सच छुपेगा नहीं ये बता दो उन्हें
झूठ जो बोलकर
सत्यवादी हुए,
खूबियाँ देख लीं, छोड़ दीं खामियाँ
आपके सब नतीज़े
विवादी हुए,
बैठकर हल निकाला नहीं इसलिए
घर के मसले, शहर में मुनादी हुए,
आखिरी फ़ैसला तो करेगा ख़ुदा
बेख़बर किसलिए तुम, ज़िहादी हुए।
34
वो मिला इश्क़ में जो था लिक्खा हुआ
वो किसी का हुआ , मैं किसी का हुआ
वक़्त लग जायेगा,
भूलने में तुम्हें
जो बिछड़ हम गये, ये भी अच्छा हुआ
उसकी शादी किसी
और से हो गयी
वक़्त अपना मुहब्बत में
जाया हुआ
अब तो बिकने
लगी है अदालत यहाँ
फ़ैसला इसलिए एक
तरफ़ा हुआ
साख़ पर जिसने
काटें उगाये सदा
ना कभी उन दरख़्तों से साया हुआ
खोदना ही पड़ा ,प्यास को ,फ़िर कुआँ
जो भी दरिया मिला, गर्द सूखा हुआ।
35
न्याय के कटघरे सिर्फ़ बाज़ार थे
वो रिहा हो गए ,जो गुनहगार थे
तख़्त पाये वही रौशनी का यहाँ
लोग जो तीरगी के , तरफ़दार थे,
आयकर खा गए, देश का लूटकर
ये ग़रीबो के कैसे मददगार थे,
जंग में खून सबका,बहा था यहाँ
इसलिए सब बराबर के हक़दार थे,
दुश्मनों से करें,क्या गिला बेख़बर
पीठ पर दोस्तों के कई वार थे।
36
टूटकर ठोकरों से गिरा
आइना
पत्थरों के शहर क्यों गया
आइना
बे-वज़ह रूप अच्छा,न कर दे बुरा
गौर से मत कभी देखना आइना
झूठ को झूठ कहता बड़े प्यार से
सच को सच ही सदा बोलता आइना
किसलिए बे-वज़ह रोज तोड़ा गया
दिल नहीं था मेरा काँच का आइना
देखतीं ही रहें
उम्रभर रातदिन
गर मिले आँख को आपसा आइना
खूबियाँ भी नज़र,आएंगी खामियां
बेख़बर पास रखना
सदा आइना।
37
प्यार तो है मग़र इज़हार नहीं करना
दिल अपना हमें
बीमार नहीं करना
इक दहलीज़ ,गर तुम,लांग नहीं सकते
तो दरिया हमें भी पार नहीं करना
इश्क़ किया है जिससे ताउम्र करूंगा
और कहीं निगाहें चार नहीं करना
गर भाये हक़ीक़त तो साथ चलो तुम
मतलब का कभी किरदार नहीं करना।
38
दिन ब दिन बढ़ रही है ज़हालत
यहाँ
मत करो ,कौम वाली सियासत यहाँ
आप ईमान अपना
नहीं बेचना
रोज़ पाला बदलती
हुकूमत यहाँ
दुश्मनी ठीक है,जाति की,वाद की
है मुसीबत में अब आदमीयत यहाँ
बो रहा नफ़रतें कौन, मालुम करो
प्यार की है सभी को ज़रुरत यहाँ
मामला हो कोई , मशविरा लीजिए
मत किया कीजिए अब अदावत
यहाँ।
39
ले गयी चैन दिल का नज़र आपकी
हाय क्या कर गयी इक नज़र आपकी
तेज़ है तीर
सी ,धार तलवार सी
अब लगे दुश्मनों को नज़र आपकी
डूबते हम नहीं,
झील होती अगर
इक समन्दर लिए है , नज़र आपकी
लफ्ज़ तक इश्क़ के हम नहीं जानते
हर ज़बाँ बोलती है, नज़र आपकी
नूर सी तीरगी में
चमकती रहे
मोतियों से जड़ी है, नज़र आपकी
रास्ते लड़खड़ाये, कहीं पर क़दम
मयकशी कर रही है, नज़र आपकी।
40
दर्द दिल का मेरे मत बढ़ाया करो
बात जो भी हो सच सच बताया
करो
क़ातिलाना बहुत है नज़र आपकी
हर किसी से नज़र मत मिलाया करो
ज़िन्दगी ने सितम भी,कहाँ कम किये
आप मत इस तरह आजमाया
करो
रास्तों की मुलाक़ात से, घर कभी
चाय पर दोस्तों को बुलाया करो
थाम ली है क़लम,जिसलिये बेख़बर
शेर उन पर, कभी तो सुनाया करो।
41
न इस पार का है न उस पार का
सफ़र इश्क़ है बीच मझधार का
हुनर तैरने का, नहीं जानता
भरोसा नहीं कोई पतवार का
न कुछ और तो याद ही कीजिए
न होता कोई काम बेकार का
घड़ी भर उन्हें देखने का सबब
नज़र को लगा रोग दीदार का
ख़ताएँ भुलाकर लगा ले गले
नहीं फ़ायदा कोई तक़रार का।
42
आसमाँ भी झुके
वक़्त के सामने
चाँद सूरज बुझे
वक़्त के सामने,
जंग को, छोड़कर जा रहे
हैं सभी
आप क्यों आ गये, वक़्त के सामने,
जब इनायत हुई, लोग राजा हुए
रंक फिर सब हुये, वक़्त के सामने,
सिर्फ़ बर्बादियाँ मत गिना कीजिए
लोग फूले फले, वक़्त के सामने,
सच तो सच,है कभी,जो बदलता नहीं
झूठ कितना छिपे, वक़्त के सामने।
43
ज़िन्दगी के सितम, कुछ ख़ता आपकी
दर्द देती रही
हर अदा आपकी,
क्यों ज़माने को हम, बेवज़ह दोष दें
आपसे ना मिली जब रज़ा आपकी,
तोड़ दी हर कसम, हो गये
गैर के
माँगता रह गया ,दिल वफ़ा आपकी,
धूप क्या छाँव ,क्या बादलों
से गिला
आपका है दिया ,
है हवा आपकी,
क्यों अदालत गया,मामला इश्क़ का
हमको मंज़ूर थी, हर सजा आपकी,
ख़्वाब आते मुझे,
रात भर आपके
नींद से भी उठाती, सबा आपकी,
बे-ख़ुदी , बे-बसी , बे-दिली
ज़िन्दगी
इस क़दर है लगी ,बददुआ आपकी।
44
सिसकियों में पलीं बेटियां
बोझ समझीं गयीं बेटियां,
प्यार बेटे सा मिलता नहीं
दर्द सहती रहीं बेटियां,
रातदिन काम करतीं रहीं
घर से निकलीं नहीं बेटियां,
अपने मन से किया कुछ अगर
रोज़ टोकी गयीं
बेटियां,
भेद सहती हुईं
उम्रभर
वेदना में जलीं
बेटियां