ज़ख्म सीने के सारे उभार आए
ग़म मिटाने मेरा दोस्त यार आये
थक चुका हूं उसे याद करते करते
अब तो हसरत है थोड़ा करार आये
मेरी बस्ती में है आज भी अँधेरा
तुम कहीं और सूरज उतार आये
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एक मुखड़े से कई किरदार करना छोड़ दे
और दरिया कश्तियों से पार करना छोड़ दे
मैंने तुमसे कब कहा के प्यार करना छोड़ दे
आदमी पर बस यहाँ एतबार करना छोड़ दे
भागते कब तक रहोगे तुम हकीकत से यहाँ
ख़्वाब जो मुमकिन नहीं,दीदार करना छोड़ दे
बारहा मौके कहाँ देती किसी को ज़िन्दगी
एक गलती बेसबब दो बार करना छोड़ दे
दुश्मनी करनी अगर है सामने आकर करो
पीठ पीछे दोस्तों पर वार करना छोड़ दे
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थोड़ा होने दे ख़राब हमको
अब पीने भी दे शराब हमको
हर इक बात पूछ लेते हो तुम
पर देते नहीं जबाब हमको
पारस जैसा रंग रूप तेरा
छूकर कर दे लाज़बाब हमको
बस इक छोटी सी ख़ुशी के बदले
अपने दे दे अब अज़ाब हमको
कर लूं कितनी भी वफ़ा उससे
आखिर देगा वो सराब हमको
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ऐसे बदली हवा देखते देखते
क्या से क्या हो गया देखते देखते
जल्दबाजी में चढ़ता चला जो गया
इतना नीचे गिरा देखते देखते
एक आँगन के टुकड़े हुए चार फिर
बाप क्या मर गया देखते देखते
कोई पूछा नहीं सच को बाजार में
झूठ बिक भी गया देखते देखते
हमने कह भी लिया उसने सुन भी लिया
हो गया फैसला देखते देखते
बात कोई वफ़ा की न हमसे करे
खा चुका हूं दगा देखते देखते
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जिसको कहते हैं प्यार पहले था
दिल किसी पे निसार पहले था
अब निगाहों में एक मन्ज़िल है
आप का इंतजार पहले था
अब तलक हैं निशान काँटों के
फूलों से ऐतबार पहले था
लोग अब मयकदों में खोज रहे
इश्क़ में जो ख़ुमार पहले था
हमसे पूछो सबब मुहब्बत का
हमने खोया क़रार पहले था
अब तो दीवार इक बना ली है
मन मेरा आर पार पहले था
रास आती नहीं इसे दुनिया
ज़िस्म ये साज़गार पहले था
अब तो मालुम है उसका चाल-चलन
वो मेरा ग़म गुसार पहले था
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जो लम्हें बीत जाते हैं वो अक्सर याद आते हैं
सफ़र में छूट जाते जो मुसाफ़िर याद आते हैं
ज़ुबाँ को रोक लो साहिब वफ़ा का नाम लेने से
नदी की बात होती है। समन्दर याद आते हैं
कई वादे कई चेहरे बनाकर लोग मिलते हैं
वो जो हमदर्द बनते थे सितमगर याद आते हैं
तहों में कुछ नमीं होगी जहाँ पानी रहा होगा
उतारे पीठ पर तुमनें वो खंज़र याद आते हैं
नहीं था कैमरा कोई मगर तस्वीर होती थी
तुम्हारे साथ वो बचपन के मन्ज़र याद आते हैं
मुहब्बत से मिले हैं ज़िन्दगी को हादसे ऐसे
जरा सा कम न कुछ ज्यादा बराबर याद आते हैं
अदब की महफ़िलों में आज सुनता हूँ लतीफ़े जब
वो जिनकी शायरी थी इल्म सुख़नवर याद आते हैं
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एक ग़लती के बस हम गुनहगार थे
जबकि अच्छे कई मेरे किरदार थे
लोग जितने कभी मेरे हमयार थे
सब के सब आपके ही तलबगार थे
प्यार करके मुझे आज मालुम हुआ
अब तलक जो किये काम बेकार थे
नाम लेकर तेरा पाँव चलते रहे
रास्तों पर कई सुर्ख़ अंगार थे
छुट्टियां खोजते थे कलेण्डर में हम
कितने सुंदर सलोने वो इतवार थे
वो हुए बेवफ़ा किसलिए बेखबर
दिल तो दिल जान देने को तैयार थे
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जा रहे हैं कश्तियों को पार लेकर
हम भँवर में आ गए पतवार लेकर
अस्ल की पहचान ख़ुद करनी पड़ेगी
लोग मिलते हैं यहाँ किरदार लेकर
ज़ख्म देकर ही गया हरबार मूझको
पर न आया वो कभी तलवार लेकर
बात करते हैं अमन की नेकपन की
लोग मन मे जो फिरें दीवार लेकर
उसने ज़ल्फो को बिखेरा क्या हवा में
और बादल आ गए बौछार लेकर
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मेरे बारे में अब सोचता कौन है
हाल बीमार का पूछता कौन है
बात करते हैं सब,अपने मतलब की अब
हक में इंसाफ़ के बोलता कौन है
एक दूजे को देते हैं सब मशविरा
आइना ख़ुद यहाँ देखता कौन है
बाढ़ आई नहीं, है बुलाई गई
देख लो तैरता , डूबता कौन है
हमने चाहा है तुमको ख़ुदा की तरह
आप इंसान हैं तो खुदा कौन है
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तुम्हें देखने का नशा दूसरा था
नज़र ने जो पाया मज़ा दूसरा था
क़दम चल पड़े वो डगर दूसरी थी
मेरी मन्ज़िलों का पता दूसरा था
कई काम हमनें किए नेकियों के
मगर जो मिला वो सिला दूसरा था
मुझे ज़िन्दगी से मिला ये तज़ुर्बा
कहीं गुल खिलाया, खिला दूसरा था
बहुत प्यार है मुझको बेग़म से लेक़िन
तेरे इश्क़ का ज़ायका दूसरा था।
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कुछ मेरी आवारगी में धीरे धीरे लुट गया
दिल तुम्हारी आशिक़ी में धीरे धीरे लुट गया
जीत जाता दुश्मनों से सामना करता अग़र
दोस्त मेरा दोस्ती में धीरे धीरे लुट गया
कुछ नज़र तुमसे मिलाकर डगमगाये उम्रभर
और कोई मयकशी में धीरे धीरे लुट गया
आपको देखा तो दिल में आग चाहत की लगी
एक दरिया तिशनगी में धीरे धीरे लुट गया
प्यार में पागल, जहाँ भर से रहा वो बेख़बर
बे-वफ़ा की बन्दगी में धीरे धीरे लुट गया।
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तेरा दीदार मिलता नहीं आजकल
दिल सँभाले सँभलता नहीं आजकल
देख ली हमने करके गुज़ारिश बहुत
कोई पत्थर पिघलता नहीं आजकल
बे-वजह रात छत पे न जाया करो
चाँद पूरा निकलता नहीं आजकल
सोचते हम रहे रातभर आपको
सोंचकर काम चलता नहीं आजकल
कुछ असर तो तुम्हारी निग़ाहों का है
पीने वाला सँभलता नहीं आजकल
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मुसीबत ज्यों मुसाफ़िर की रवानी आज़माती है
नए क़िरदार को अक्सर कहानी आज़माती है
चमन के हर गुलिस्ताँ की नई ख़ुशबू अता करके
उबलते ख़ून की रंगत जवानी आज़माती है
किसी इक मोड़ पर भटके, भटकते ही रहोगे फिर
सफ़र में मन्ज़िलों तक ज़िन्दगानी आज़माती है
ज़रा ख़ामोश चहरों को भी पढ़ना सीख लेना तुम
सलीके सादगी के बे-ज़बानी आज़माती है
के सीखो सामना करना जहां की हर मसाइल से
हुनर गाहे - बगाहे पासबानी आज़माती है।
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कुछ नमीं आँख की मोतियों में ढली
याद जब आपकी तल्ख़ियों में ढली
आइने कर उठे ज़िक्र फिर आपका
आह फ़िर देर तक सिसकियों में ढली
भूल पाया कहाँ दिल तेरी साज़िशें
उम्र आधी मेरी साज़िशों में ढली
तिनका-तिनका हुआ फूस का घर मेरा
क्यों हवा प्यार की आँधियों में ढली
ऐब जैसे कोई छूटता ही न हो
उस तरह तू मेरी आदतों में ढली।
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मचलते हुए आबशारों से बचना
भँवर से ज़ियादा किनारों से बचना
नया कोई ज़ोखिम उठाता नहीं है
सभी चाहते हैं ख़सारों से बचना
हो मन्ज़र हसीं तो नज़रभर निहारो
जो बदलें मुसलसल नज़ारों से बचना
बसर जैसे-तैसे ही करती ग़रीबी
बशर चाहता है बज़ारों से बचना
ये मिट्टी तुम्हारी अना है सँभालो
हो मुमकिन अग़र तो सितारों से बचना
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जीस्त से मशविरा किया होगा
हादसा यूँ नहीं हुआ होगा
लोग अक़्सर उसे सतातें हैं
लगता वो आदमी भला होगा
भूख तड़पा बहुत रही होगी
उसने तब ज़हर खा लिया होगा
तुम दिवाने नहीं हुए अब तक
इश्क़ पागल नहीं हुआ होगा
नाप लेंगे वही क़दम मन्ज़िल
रास्तों का जिन्हें पता होगा।
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के बढ़ने लगी बेक़सी धीरे -धीरे
ख़फ़ा हो गयी हर ख़ुशी धीरे-धीरे
ये पानी अचानक नहीं सर पे आया
नदी मुश्किलों की चढ़ी धीरे-धीरे
तेरी रहबरी से सबब यह मिला है
हमें आ गयी रहज़नी धीरे-धीरे
सलाख़ों की मुझको हुई जब तमन्ना
सजा हो रही मुल्तवी धीरे-धीरे
निभाते रहे इस तरह दुश्मनी वो
के हो जाये फ़िर दोस्ती धीरे-धीरे
न इस बात का ग़म किसी को यहाँ है
ज़ुदा हो रही ज़िन्दगी धीरे-धीरे
अग़र सच को सच आप लिखते रहेंगे
तो मिट जाएगी हर बदी धीरे-धीरे
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बिन हवा के ये ज़द हुआ कैसे
दीप जलता हुआ बुझा कैसे
सिर्फ़ अपने लिए करोगे तो
काम आख़िर करे दुआ कैसे
एक ही मिट्टी से बने हैं तन
मन से इतने ज़ुदा ज़ुदा कैसे
बात यह क़ब्र ही बताएगी
ज़िन्दगी होती है ख़फ़ा कैसे
इश्क़ वाले ही जान पाते हैं
जीस्त करती है मोजिज़ा कैसे।
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वही बुझ गए जो बुझाने चले थे
कई लोग सच को हराने चले थे
ग़रीबी मिटाने के वादे थे झूठे
वो साहिब तो सत्ता को पाने चले थे
वही खाइयाँ खोदते फिर रहे हैं
जो दीवार-ए-नफ़रत गिराने चले थे
नहीं जानते ख़ुद हुनर तैरने का
वो कश्ती हमारी डुबाने चले थे
क़दम दो क़दम साथ चलतक न पाए
वो जन्मों के वादे निभाने चले थे।
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लौट आओ किसी बहाने से
तुमको देखा नहीं ज़माने से
सिलसिला बढ़ गया ख़यालों का
काम ना चल सका भुलाने से
दिल को थोड़ा बहुत सुकूँ मिलता
उसकी तस्वीर को बनाने से
लोग चहरे को पढ़ समझ लेंगे
बात छिपती कहाँ छिपाने से
ज़िन्दगी से जो डगमगाये थे
लोग सँभले शराब खाने से
दिल की फ़ितरत कमान जैसी है
तीर लौटा नहीं निशाने से
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हम तो लेकर चले थे नमी का हुनर
दोस्तों से मिला दुश्मनी का हुनर
आदमी के लिए काम आए न तो
बे-मुरव्वत है वो आदमी का हुनर
लाख दौलत कमाने से क्या फ़ायदा
ग़र न आया तुम्हें ज़िन्दगी का हुनर
मुद्दतों आग सूरज की सहनी पड़ी
तब मिला चाँद को चाँदनी का हुनर
दिल तो टूटे हज़ारों यहाँ प्यार में
सबने पाया नहीं शायरी का हुनर।
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बड़ी मुश्किल कहानी हो रही है
मिरी बिटिया सयानी हो रही है
खिलें हैं आदमी में रंग ताजे
मग़र दुनियाँ ख़िज़ानी हो रही है
नज़र भर देख लो इन पत्थरों को
यहाँ हर चीज पानी हो रही है
जफ़ा से दोस्ती कर ली ज़िगर ने
या दुश्मन ज़िन्दगानी हो रही है
मुसलसल हो रहे बर्बाद हम ही
हमारी मेज़बानी हो रही है
मैं उसका फ़िर भरोसा कर रहा हूँ
वही ग़लती पुरानी हो रही है।
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चाक गिरेबाँ सीने वाले
सुन ले अर्ज़ मदीने वाले
इक मौज बताकर लौट गई
डूब रहे हैं सफ़ीने वाले
धोखा खाकर मर जाते हैं
जी लेते हैं जीने वाले
क्यों ना बुझती प्यास हमारी
पीते क्या हैं पीने वाले
वो क्या समझें ग़ुरबत मेरी
उसके हाँथ नगीने वाले
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बड़ी दूर तक कोई नाता नहीं है
ये दिल है कि उसको भुलाता नहीं है
उसी मोड़ पर ज़िन्दगी आ खड़ी है
जहाँ कोई ज़ोखिम उठाता नहीं है
फ़क़त रौशनी से गुजारा न होगा
दीया प्रेम का जो जलाता नहीं है
पहुँचता कहाँ है बड़ी मन्ज़िलों तक
हुनर जब तलक चोट खाता नहीं है
मुहब्बत में पगली चली जाएगी फिर
नदी को समन्दर बुलाता नहीं है
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मुहब्बत के सहारे से अदावत याद रखती है
के किसको कब लड़ाना है सियासत याद रखती है
किसे फ़ुर्सत यहां इतनी निभाये रिश्ते-नाते सब
कहाँ किसको मिलाना है ज़रूरत याद रखती है
के धन दौलत से भारी है जिधर पलड़ा तराजू का
उसी इंसाफ की बातें अदालत याद रखती है
नबाबी राजशाहों को बुलन्दी भूल भी जाए
हुनर के हर मुसाफ़िर को मुसीबत याद रखती है
सदाक़त से मुहब्बत की रिफ़ाक़त छीन लेती है
ये दुनियाँ जंग को अक्सर ब-सूरत याद रखती है
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हुश् न में अब सादगी मिलती नहीं
आशिकों में आशिकी मिलती नहीं
सोचकर ही पाँव रखना प्यार में
इस डगर में वापसी मिलती नहीं
कुछ हुनर दीदार का अब सीखिए
हर नज़र को रौशनी मिलती नहीं
ज़िस्म,साँसे धड़कने मिल जाएगीं
हर किसी को ज़िन्दगी मिलती नहीं
डूबती हैं कश्तियाँ सैलाब में
प्यास को अक्सर नदी मिलती नहीं
बज़्म का लहज़ा सुहाना है मग़र
मीर जैसी शायरी मिलती नहीं
जाम पीकर क्या करूँ अब बेख़बर
मयकदों में मयकशी मिलती नहीं।
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मुश्किलों का सामना होगा
रास्ते में और क्या होगा
ना मिली मन्ज़िल मुझे तो क्या
ज़िन्दगी का तज़र्बा होगा
साहिलों पर थोड़ा ज़ोखिम है
फिर समन्दर आपका होगा
मैं भरोसा भी नहीं करता
आदमी है बेवफ़ा होगा
चाहता है अब सुलह करना
चाल दुश्मन तो चला होगा
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झूठ की हर निशानी लिखेगा
वक़्त जब ज़िन्दगानी लिखेगा
बे-वफाओं का मज़मा लगेगा
इश्क़ जब जब जवानी लिखेगा
श्याम को कोई छलिया लिखे भी
प्रेम मीरा दिवानी लिखेगा
याद आ जाएगें हादसे जब
बात कोई पुरानी लिखेगा
हर जगह नाम तेरा ही होगा
दर्द दिल की कहानी लिखेगा
बेख़बर आग से डर गए तो
कौन पानी को पानी लिखेगा।
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दिल नहीं लगता हो तो यार पुराने ढूँढ़ो
ना मिलें यार तो फिर गुज़रे ज़माने ढूँढ़ो
उड़ गए पंछी सभी इस डाल को छोड़ कहीं
तीर से कह दो कहीं और निशाने ढूँढ़ो
झूठ स्वीकार तेरा कर तो लिया है लेकिन
कुछ कुछ सच्चे से लगें ऐसे बहाने ढूँढ़ो
रेत ही रेत है इस उजड़े हुए सहरा में
तुम किसी और समन्दर में खज़ाने ढूँढ़ो
दौर बाज़ार का है काम करे मतलब से
दिल की ख़ातिर अब तुम लोग दिवाने ढूँढ़ो
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नहीं आग की अब कोई दास्तां है
मेरी ज़िन्दगी में धुआं ही धुआं है
कहीं खो गया नेकियों का ज़माना
बड़ा ही सितमगर ये सारा जहां है
कई दर्द दिल में लिए फिर रहा हूँ
न है ज़ख्म कोई न कोई निशां है
के जिस मोड़ पर लोग शामिल हुए थे
उसी मोड़ पर लुट गया कारवां है
कहाँ दूर उससे हुए आज भी हम
भले फ़ासला अब मेरे दरमियाँ है
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हमेशा पास अपने आइना रखना
बुरी चीजों से थोड़ा फ़ासला रखना
न जाने कौन सा, कब काम पड़ जाए
ज़रूरी है सभी से राब्ता रखना
समन्दर के सफ़र पर निकले हो घर से
मिलें ग़र मुश्किलें तो हौसला रखना
किसी से दुश्मनी कितनी भी बढ़ जाए
खुला तुम दोस्ती का रास्ता रखना
नज़ारत की ज़रूरत है मुहब्बत में
मनाने रूठने का सिलसिला रखना
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दर्दए-ग़म बेक़सी बेबसी आयी है
अपने हिस्से कहाँ ज़िन्दगी आयी है
मुद्दतों बाद उनसे निगाहें मिलीं
आज आँखों में फिर से नमीं आयी है
रौशनी का हवाला दिया था हमें
छत पे थोड़ी-बहुत चाँदनी आयी है
महज़ पानी से होगा गुज़ारा न अब
भूख लेकर बहुत तिशनगी आयी है
नेकियों का सबब मुश्किलें दे रहा
मुश्किलों से हमें शायरी आयी है।
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चाँद की चाँदनी सब नहीं चाहिए
अपने हिस्से की बस रौशनी चाहिए
ग़र हुनर ख़्वाब देखे, तो भी ठीक था
ज़िन्दगी बे-हुनर को हसीं चाहिए
दोस्ती बन्दगी या करे दुश्मनी
पाक ईमान का आदमी चाहिए।
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साज़िशों को हादसा पैहम बताया जा रहा
खून सड़को पर सियासी अब बहाया जा रहा
घर जलाए फिर कहीं पर रौशनी के नाम पर
वोट ख़ातिर फ़िर कहीं आवास बाटा जा रहा
चाटुकारों को मिली सरकार की हर योजना
जो सही हकदार थे उनको सताया जा रहा
अज़नबीयों से नए रिश्ते निकाले जा रहे
भाई-भाई को यहाँ दुश्मन बनाया जा रहे
पूँजीवादी लोग जबसे आए हैं सरकार में
फिर ग़रीबों पर बख़ूबी ज़ुल्म ढाया जा रहा
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मुल्क़ की बर्बादियों का काम करती हस्तियाँ
भूख की ज़द में यहाँ हैं ढेर सारी बस्तियाँ
आग की बुनियाद पर कैसे खिलेंगे फूल अब
आदमी ने ख़ुद उठाईं नफ़रतों की आँधियां
खिलखिलाहट से भरे आँगन सुहाने ना रहे
ना रहे देवर जी वैसे ना रहीं अब भाभियाँ
लूटकर अस्मत लुटेरे आ गए सरकार में
खौफ़ में अब जी रहीं हैं आजकल की बेटियाँ
नेकियों के नाम पर ,होती सियासत बेख़बर
हर सियासी भर रहा है मज़हबों में तल्खियाँ
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पर्वतों पर हम नया परचम लगाकर आए हैं
पत्थरों के सामने शीशे लगाकर आए हैं
जो हमारी पीठ पर ख़ंजर चुभाने आया था
हम उसी के ज़ख्म पर मरहम लगाकर आए हैं
हम भले भटके बहुत ,इन रास्तों पर उम्रभर
अपने बच्चों के लिए मन्ज़िल उठाकर लाए हैं
आज मेरे साथ है जो कारवाँ मत देखिए
मुश्किलों की ज़िन्दगी तनहा बिताकर आए हैं
यूँ नहीं इस पार आकर हम खड़े हैं बेख़बर
धार में मझधार का ज़ोखिम उठाकर आए हैं
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बड़ी ज़ालिम हुक़ूमत है अदावत मार डालेगी
तुम्हें भी झूठ कहना है सदाक़त मार डालेगी
नहीं सुनता ग़रीबों की कोई थाना कचहरी में
अग़र इंसाफ़ माँगोगे अदालत मार डालेगी
कई पर्दों के पीछे से, सियासी ज़ुल्म करता है
जियो सहते हुए वरना सियासत मार डालेगी
फ़रेबी हुश्न वाले इश्क़ का व्यापार करते हैं
नए ताज़िर को उल्फ़त की तिज़ारत मार डालेगी
बुढ़ापा बोझ लगता हैं कहीं माँ-बाप का अपने
कहीं बेबा को बच्चों की ज़रूरत मार डालेगी
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झूठ कहें ये सच के जैसे
लोग मिले हैं कैसे कैसे
जान हमारी ले लो चाहें
हम ना होंगे तेरे जैसे
जाने वाले मत सोंचो तुम
जी लेंगे हम जैसे तैसे
वक़्त न जाने क्या कर डाले
काम न करना ऐसे वैसे
हम फूल नहीं, इक ख़ुश्बू हैं
मिट जायेगें ऐसे कैसे
मन्ज़िल के साथ ही सोंचो
नापोगे तुम रस्ते कैसे
नाम के हैं अब रिश्ते-नाते
सब करते हैं पैसे पैसे।
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वही आलम है वर्षों से घराना क्या गरीबों का
भटकना ही मुक़द्दर है ठिकाना क्या गरीबों का
के पापी पेट के ख़ातिर बनें मज़दूर फिरते हैं
ज़मीं की धूल हैं साहिब, ज़माना क्या गरीबों का
अमीरों की सियासत नें, किया शोषण बहाने से
लुटे हों ख़्वाब जिनके, मुस्कराना क्या गरीबों का
न रोटी है न कपड़ा है, शिक्षा की बात छोड़ो तुम
के बहरों को सुनाएं हम, फ़साना क्या गरीबों का
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झूठ की बात छिप नहीं सकती
बात निकली तो रुक नहीं सकती
पानी बादल बने , बरस जाए
आग से आग ,बुझ नहीं सकती
अपनी रफ़्तार ख़ुद बढ़ा लो तुम
वक़्त की चाल ,रुक नहीं सकती
ग़र नहीं बाँध , तुम बना सकते
बहती धारा बदल नहीं सकती
हस्ती अपनी हुनर के दम से है
इतनी जल्दी ये मिट नहीं सकती
0
पीने का इंतज़ाम सारा कर लिया
इश्क़ उनसे फिर दुबारा कर लिया
आज महफ़िल ढूंढती है हर ख़ुशी
दर्द नें तन्हा गुज़ारा कर लिया
आपका हो फ़ायदा, बस इसलिए
हमने ख़ुद अपना, ख़सारा कर लिया
दुश्मनों से बाजियां फिर जीत लीं
दोस्तों से जब किनारा कर लिया
मुस्कराहट देख अपने बेटे की
हमने ज़न्नत का नज़ारा कर लिया।
0
सो रहे फुटपाथ पर कुछ आशियानों के लिए
लोग लाखों दर-बदर हैं चार-दानों के लिए
स्कूल पढ़ने जाएं बच्चे, दाल-रोटी खाएं सब
वालिदों नें ज़िन्दगी दी, कारखानों के लिए
मुल्क़ के बनकर मुलाज़िम आये थे बाज़ार में
नौकरी करते हैं साहिब बेईमानों के लिए
बेसबब सी ख़्वाहिशें , बेज़ार ना कर दें तुम्हें
छोड़ मत देना ज़मीं , उन आसमानों के लिए
आज सच के साथ तुम आये नहीं तो बेख़बर
कौन फ़िर आवाज़ देगा बे-ज़ुबानों के लिए।
0
उसनें समझा खार लिए हैं
हम फूलों का हार लिए हैं
खा जाती हैं आँखें धोखा
लोग कई किरदार लिए हैं
इश्क़ का हमसे हाल न पूछो
तीर ज़िगर के पार लिए हैं
खौफ़ किसे मझधार का तेरी
हम भी इक पतवार लिए हैं
प्यार का पाठ पढ़ाने वाले
लोग यहाँ औज़ार लिए हैं
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मुन्सिफ़ों का इतना सस्ता दाम है
बे-गुनाह पे क़त्ल का इल्ज़ाम है
हर तरफ़ पतझर नज़र आया हमें
गुल तेरा, गुलशन कहाँ गुलफ़ाम है
आदमी का खून पीता आदमी
मयकदा तो मुफ़्त में बदनाम है
ज़िस्म का परचम ज़माने भर में है
मन का सूरज आज भी गुमनाम है
मुश्किलों का नाम है इक ज़िन्दगी
क़ब्र वालों को फ़क़त आराम है।
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पाल बैठा कई अरमान शायद
दिल तेरा है अभी नादान शायद
सच को मिलता कहाँ इंसाफ सच्चा
बिक चुके हैं सभी मीज़ान शायद
सूना-सूना सा है आलम ये सारा
आ चुका है कोई तूफ़ान शायद
सुन ख़बर,क़त्ल की सहमें न धड़कन
आदमी हो गया बे-ज़ान शायद
वो कई रोज़ से ख़ामोश है अब
हो चुकी ख़त्म, हर इम्कान शायद
मुद्दतों ख़्वाब को तरसें निग़ाहें
दिल मेरा हो गया वीरान शायद
दिन में छाने लगा हर-सू अँधेरा
बुझ चुके हैं सभी लोबान शायद
0
सौदेबाज़ी चल रही सरकार में
लोग उलझे फिर रहे बेकार में
चार पैसे क्या दिखे, बिकने लगे
लालची जो लोग थे बाज़ार में
पानियों के शहर जाने के लिए
पाँव कितने चल चुके अंगार में
चाँद को ताकेँ,भला हम किसलिए
चैन आता जब तेरे दीदार में
बस वफ़ा काफ़ी है चाहत के लिए
खामियाँ क्या देखते किरदार में
बात से इनकार होगा, और क्या
देर मत करना कभी इज़हार में
साहिलों ने साथ छोड़ा बेख़बर
कश्तियाँ डूबी कहाँ मझधार में।
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पहले इक दीवार बनाई जाएगी
फिर झगड़े की बात उठाई जाएगी
इक दो घर में छप्पर रक्खें जाएगें
फिर बस्ती में आग लगाई जाएगी
बूदों का छिड़काव कराया जाएगा
टी.वी. पर बरसात दिखाई जाएगी
फिर साँपों को दूध पिलाया जाएगा
आस्तीनों की प्यास बुझाई जाएगी
ज़ुल्म मुसलसल जारी है इस मुल्क़ में
आख़िर कब तलवार उठाई जाएगी।
0
आदमीयत से सारा जहाँ दूर है
किस नशे में यहाँ आदमी चूर है
साथ देता नहीं कोई कमज़ोर का
लूट लेना बना आज दस्तूर है
एक तबक़ा वतन में रईशों का है
एक तबक़ा ग़रीबी से मज़बूर है
बेच दी रौशनी, चाटुकारों को सब
नेकियों का नगर आज बे-नूर है
छोड़ दो आप मरहम लगाना इसे
हो चुका ज़ख़्म दिल का ये नासूर है
तोड़ना चाहता दर्द अपनी हदें
हादसों से मेरा हाल मंशूर है
ज़िक्र करता नहीं,आसमाँ पर कोई
इस ज़मीं पर, बड़ा चाँद मशहूर है
0
दुनियां का जबसे हर चलन बाज़ार हो गया
झूठा बहुत इन्सान का किरदार हो गया
देखो जिसे मशरूफ़ है दौलत की होड़ में
जीना यहाँ ईमान से दुश्वार हो गया
अब तो तुम्हारे नाम से होने लगे सितम
वहशी बहुत मौला तेरा संसार हो गया
पैरों तले रौंदी हुई , कलियों को देखकर
जो शख़्स पहले फूल था खार हो गया
रस्ते कहाँ दुश्वार थे मन्ज़िल के बेख़बर
अब आदमी की ,आदमी दीवार हो गया।
0
चादर और बढ़ाया जाए
पैरों को पसराया जाए
चल, हाँथ हतौड़ा छेनी है
पर्वत आज झुकाया जाए
बात सुने, संसद हम सबकी
जोर से यदि चिल्लाया जाए
गुल के पीछे दौड़ रहे सब
पतझड़ कोई खिलाया जाए
ढूंढ निशाना पहले अपना
तीर कहाँ तक जाया जाए
प्यार तुम्हारा ज़ालिम इतना
ना खोया , ना पाया जाए
0
ज़िस्म-जाँ ,धड़कन में चलता ,बस फ़साना आपका
दिल हमारा बन चुका है कारखाना आपका
अह हवा उनको बता दे आशिकी क्या चीज है
नाम लेकर जी रहा है इक दिवाना आपका
एक दिन आकर सड़क पर, बेवज़ह आँसू बहा
शहर में छाया हुआ है मुस्कराना आपका
चाहने वाले तुम्हारे बढ़ रहे हैं इस क़दर
एक दिन हो जाएगा सारा ज़माना आपका
उम्रभर भटके बहुत इस ज़ुस्तज़ू में बेख़बर
मिल न पाया आज़तक हमको ठिकाना आपका
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बहुत है आदमी लाचार आख़िर कौन रोकेगा
लुटेरी हो गई सरकार आख़िर कौन रोकेगा
यहाँ बादल समन्दर में बरसते हैं हुक़ूमत के
ज़मीं पर आग की बौछार आख़िर कौन रोकेगा
खनक सुनकर सुनाए जब अदालत फ़ैसले अपनें
के बढ़ता रोज भ्रष्टाचार आख़िर कौन रोकेगा
उगी नफ़रत, जली मूरत , हुआ दंगा, गई जानें
बना मज़हब ,यहाँ बाज़ार आख़िर कौन रोकेगा
कभी मिलने नहीं देते मुहब्बत को मुहब्बत से
बुरे करते खड़ी दीवार आख़िर कौन रोकेगा
करे झूठा भरे सच्चा, फिरा करता नकाबों में
बदलता आदमी किरदार आख़िर कौन रोकेगा।