सोमवार, 19 अगस्त 2024

हिंदी साहित्य किराना स्टोर (वैभव बेख़बर)

 प्रेम का भाव बड़ा है लेकिन

देह  का  आकर्षण  क्या  है,


पहले-पहल जो आँख को भाता

फिर तन-मन में जिज्ञासाएँ जगाता

साधन,  रस्ते  , प्रयत्न  , मचलते

मिल जाये मंज़िल  जी  ललचाता,

धन-दौलत जुटा रही है दुनियाँ

सुख-चैन नहीं  है  कारण क्या है!


बुनकर, भ्रम  के  जाल  उलझते

मृग  जैसे  खोजत कस्तूरी फिरते

बस जीते हैं कुछ ऐसे कुछ वैसे

पर राजा और रंक  सभी है मरते,

आरोग्य  होती  हैं  अभिलाषायें

सक्रमण हैं तो  निवारण  क्या है



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जहाँ  अल्प-विराम लगाने थे

वहाँ  पूर्ण विराम  लगा बैठे,


एक पथ नया बनाना था पर

हम पद-चिन्हों से गुजर आये,


वो पाया भी, जो  पाना था लेकिन

अब  उसका  कोई  अर्थ नहीं है,


कुछ ज्ञात हुआ  यह बात सत्य है

पर  सार  भूल  गये  जीवन का,


चित्त  में  मधुर  प्रवाह  नहीं  है

अब  सम्बन्धों में ठहराव नहीं है,


नित्य स्वार्थ  हर  जगह  हावी है

कुछ  पाने  की  आपा-धापी  में!



शेर


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गरीबी ही जहन्नुम है इस ज़मी पर

मगर इस जहन्नुम से निकला जा सकता है



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मंज़िलें जानती है कद हमारा

बेख़बर  पाँव  मे छाले बहुत हैं

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हो जाती है मुकम्मल उसके बगैर भी

जिसके बगैर लगती है नामुमकिन सी ज़िंदगी


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गर ये सरकार  बदल भी जाये  तो क्या होगा

फिर आवाम के साथ नये ढंग से धोखा होगा


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सीख रहे सदियों से  इल्म  किताबी

आखिर हम कुदरत से कब सीखेंगें,


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अक़्ल से  कुछ  कच्चे  लगते हो

अब   भी  तुम  बच्चे  लगते  हो,


ताला   माँग   रहा   है  चाभी

लेकिन  तुम  गुच्छे  लगते  हो,


शक़्ल से  दिखते भोले-भाले

रंगत    के   लच्छे  लगते  हो,


हर  झूठ   तुम्हारा  मालूम  है

जाने   क्यों   सच्चे  लगते  हो,


और  तो  कोई  बात  नहीं  है

मुझको  तुम  अच्छे  लगते  हो!


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शहर  आकर  किया  याद  क्यों  गाँव  को

धन  कमाकर  किया याद  क्यों  गाँव  को,


लाज  शर्मो-हया  कुछ  बचा  ही  नहीं

गाँव  अब  गाँव जैसा  रहा   ही  नहीं,


रामू काका  गये   छोड़कर  यह  धरा

अब  किसी से करे  ना  कोई मशविरा,


साँझ  ढलते  ही  चौपाल  सजती थी जो

ना  रही  वो  गली  आगे  खुलती  थी जो,


ना  रहा  ताल  वो,  ना  रहा  वो  कुआँ

पानी  भरते   नहाते  थे  मिलकर जहाँ,


ना रहा  अब  चलन  पहले  जैसा  यहाँ

नीम  पीपल  यहाँ  बरगदी  छाँव  थी


दूर  जाकर   किया  याद  क्यों  गाँव  को,

शहर आकर  किया याद .....................


क्यों  न उद्योग  लगाये   गये  गाँव  में

क्यों  न  साधन  जुटाये  गये  गाँव  में,


अन्नदाता    का  थोड़ा  अदब  कीजिये

और  मजदूर की कुछ  मदद  कीजिये,


गाँव  की ओर  साहब  नज़र  डाल  दो

अच्छी  शिक्षा  सड़क  और अस्पताल दो,


तख़्त  दिल्ली का जिस दिन समझ जायेगा

गाँव     वीरान   होने  से  बच   जायेगा,


खेत-खलिहान  सूने  पड़े   बाग  हैं


ज़ुल्म  ढाकर  किया   याद  क्यों  गाँव को,

शहर  जाकर  किया   याद  क्यों  गाँव को

धन  कमाकर  किया  याद...............!




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इक अलग  रस्म  है   इश्क की  रस्म  में

इक अलग   उम्र  है   इश्क की ज़िस्म में,

इश्क़  ने  जब  हँसाया,  हँसाया  बहुत

इश्क  ने जब  रुलाया,  रुलाया  बहुत,

दुनियाँ   दौलत  के  पीछे  परेशान  है

और  दौलत   मुहब्बत  से  अनजान है,

इश्क   उन्माद  है,  इश्क  फरियाद  है

ना-समझ,    ना-समझ  इश्क उस्ताद है,

इश्क  दरिया  भी है, इश्क  ज्वाला भी है

प्यास  भी  इश्क  है, इश्क  हाला  भी  है,

इश्क  अज्ञात  को   खोजने  की  डगर

इश्क  आदर्श  को   देखने   की  नज़र,

ज़िंदगी  को   तज़ुर्बे   मिलें   इश्क  में

गुल  अमूमन  उजड़कर  खिलें इश्क में,

इश्क  की  पाठशाला  पढ़ो  बेख़बर

इश्क  का  दीप बनकर जलो  बेख़बर!




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रफ़्ता-रफ़्ता मरता है गरीब तिल-तिल कर

दफ़्न होने तक  दुनियाँ  यकीं  नहीं करती!


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रोजी-रोटी की मेहनत, जर्जर कर देती है तन

हमनें  मज़दूरों  के  जिस्मों  को  देखा  है


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तुम्हारी ये बौखलाहट वाजिब है

सवाल अक्सर  बुरे ही  लगते हैं




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अस्ल  हालात से  रु-ब-रु  कहाँ

शायरी  हुस्न का  होके रह  गई!

        वैभव बेख़बर

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न होगा  अब  सदाक़त  से  गुज़ारा

सियासी   हो  गया  है   दौर   सारा,


जमाती-जाति  रचने  वाले  मौला

लहू  का रंग  कर  दे अलग  हमारा,


सिखाये  भेद  करना   आदमी  में

एसा मज़हब  नहीं  मुझको गवारा,


भँवर   में  कश्तियाँ  मजबूरियों  कीं

गरीबों   को    कहाँ  मिलता किनारा,


बग़ावत  पर   उतर  आओ  कमेरों

अगर ज़ालिम न दे अब हक़  तुम्हारा,


जुदा  होकर  नहीं  खिलते कभी गुल

न  मिलते  हैं  किसी  को  हम दुबारा,





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लगी  है  यार  की  क़ीमत

रही  ना प्यार  की  क़ीमत,


हर इक ख़्वाहिश का निकला दम

न  पूछो   हार  की  क़ीमत,


वहाँ  कुछ  बात  तो  होगी

जो है  उस   पार  की  कीमत,


हुई   इंसान   से   ज़्यादा

यहाँ  हथियार  की  क़ीमत,


गले    झुकने   लगे  जबसे

उठी   है   हार  की  क़ीमत,


नज़र  खोकर   चुकाई   है

तेरे    दीदार     की  क़ीमत,


किसी   ज़रदार   से  पूछो

यहाँ  दरबार    की   क़ीमत,


सरे - बाज़ार    लगती   है

यहाँ   लाचार   की  कीमत,


के  जाकर    बाँध  से  पूछो

नदी की  धार   की  क़ीमत,


समझ लो तुम  कहानी  से

मेरी   किरदार  की  क़ीमत!


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ख़्वाब  जितने   ख़याली  थे  घबरा  गए

ज़िन्दगी  की   हक़ीक़त  से   टकरा  गए,


वो  जो  होते  हैं  जीवन मे इक ही दफ़ा

वो  सभी   हादसे   मुझ  पे   दोहरा  गए,


तिनका-तिनका  समेटा  था  जिनके लिए

एक  झोंके   के   जैसे  वो    बिखरा  गए!


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  इश्क़  है  इस दौर का  तवायफ़ी

  लोग   पैसों  से   ख़रीद  लेते  हैं!

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बदलते वक़्त  को  समझो  इशारा  कर रहा है

हुनरमंद  आदमी  ही  हर  नज़ारा  कर रहा  है


जुटा पाया  न वो हिम्मत  हमारे  साथ चलने की

दुआएँ   दे  रहा  है  और   किनारा  कर  रहा  है!


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किसी के शौक से उसका किरदार मत तौलो

नारी का  शौक़  है  श्रंगार  करना

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मत  सिखाओ  बादशाहों  की  इबादत  करना

बेख़बर है  नाम, फ़ितरत  है  बग़ावत  करना


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फैली  आरजकता, नफ़रत  देखो

जीवन में  नेकी की  ज़हमत देखो

सूरत  से   उल्टी    सीरत  देखो

आँखे   कहतीं    कीमत  देखो

पाँव  कह  रहे  हालत  देखो,

कहते  सब  खुद  को  फिरऔन

पर  झूठ  को  झूठ  कहेगा कौन,


मंदिर,  मस्ज़िद  गिरजा गुरुद्वारों में

राहों  में  कुछ  चौबारों  में

अच्छा, सच्चा  बनके  बैठा है जुल्म

जंगल,   बस्ती    शहरी  बाजारों  में,

यदि शिक्षित  कंठ  रहेंगे  मौन

तो  झूठ  को  झूठ कहेगा कौन!






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