सोमवार, 12 मई 2025

God is a toy, human is a robot

मनुष्य स्वयं से, समाज से, और ईश्वर से अपेक्षाएँ रखता है—न्याय, नैतिकता और आदर्श की। मगर क्या वह स्वयं इन अपेक्षाओं पर खरा उतरता है? शायद नहीं। क्योंकि मनुष्य, जब सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं में जीता है, तो अपने स्वार्थ के अनुरूप ही तत्वों को प्राथमिकता देता है।

हम और आप नेताओं का चयन किस आधार पर करते हैं? योग्यता, चरित्र और नीति पर नहीं—बल्कि धर्म, जाति और स्वार्थ देखकर। यह चयन प्रणाली हमारे सामूहिक नैतिक पतन का प्रमाण है।

यदि ईश्वर का अस्तित्व है, तो वह सोने (Gold) की तरह शुद्ध और अमूल्य होना चाहिए—एकरस और एकतत्व। लेकिन हमने उसे कंगन, हार, झुमका, टीका, और जंजीर की तरह बाँट दिया है। धर्म की एकता को संप्रदायों, जातियों और पंथों में तोड़कर आज दुनिया नस्ली और सांप्रदायिक युद्धों के कगार पर खड़ी है।

हमने अपने चारों ओर की हर व्यवस्था को मैला कर रखा है। आदर्शहीन समाज कभी भी एक सशक्त राष्ट्र की नींव नहीं रख सकता। आपने जापान की वह घटना सुनी होगी जहाँ एक यात्री ट्रेन की फटी सीट को सुई-धागे से सिल रहा था—क्योंकि वह इसे अपनी जिम्मेदारी समझता है। वहीं विकसित देशों में ट्रैफिक समस्याएँ नहीं होतीं, क्योंकि वहाँ लोग अनुशासन में रहते हैं। इसके विपरीत, पिछड़े देशों में कहा जाता है:
"यहाँ सरकारी आदमी काम न करने के लिए तनख्वाह लेता है और काम करने के लिए रिश्वत।"

गांधारी का कथन  है:
"तुम जिसे प्रभु कहते हो (कृष्ण), उसने जब चाहा, मर्यादा को अपने हित में बदल लिया।"
मनुष्य अपने हितों के अनुसार नैतिकता की परिभाषा बदलता है।

आज का मनुष्य अपने भीतर एक आदर्शवादी मनुष्य का निर्माण नहीं कर पा रहा है, मगर वह मजबूत राष्ट्र के निर्माण के स्वप्न जरूर बुन रहा है। यह विरोधाभास है। वह व्यक्ति जो अपने ही अहंकार में स्तब्ध है, समाज तो छोड़िए, अपने परिवार में भी सामंजस्य नहीं रख पा रहा, वही दुनिया को सुधारने की बातें करता है।

वास्तविक परिवर्तन तब ही संभव है जब हम अपेक्षा करने से पहले आत्मावलोकन करें—हम क्या दे रहे हैं, और क्या बनने की कोशिश कर रहे हैं। वैभव बेख़बर

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