ज़ख्म सीने के सारे उभार आए
ग़म मिटाने मेरा दोस्त यार आये
थक चुका हूं उसे याद करते करते
अब तो हसरत है थोड़ा करार आये
मेरी बस्ती में है आज भी अँधेरा
तुम कहीं और सूरज उतार आये
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एक मुखड़े से कई किरदार करना छोड़ दे
और दरिया कश्तियों से पार करना छोड़ दे
मैंने तुमसे कब कहा के प्यार करना छोड़ दे
आदमी पर बस यहाँ एतबार करना छोड़ दे
भागते कब तक रहोगे तुम हकीकत से यहाँ
ख़्वाब जो मुमकिन नहीं,दीदार करना छोड़ दे
बारहा मौके कहाँ देती किसी को ज़िन्दगी
एक गलती बेसबब दो बार करना छोड़ दे
दुश्मनी करनी अगर है सामने आकर करो
पीठ पीछे दोस्तों पर वार करना छोड़ दे
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थोड़ा होने दे ख़राब हमको
अब पीने भी दे शराब हमको
हर इक बात पूछ लेते हो तुम
पर देते नहीं जबाब हमको
पारस जैसा रंग रूप तेरा
छूकर कर दे लाज़बाब हमको
बस इक छोटी सी ख़ुशी के बदले
अपने दे दे अब अज़ाब हमको
कर लूं कितनी भी वफ़ा उससे
आखिर देगा वो सराब हमको
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ऐसे बदली हवा देखते देखते
क्या से क्या हो गया देखते देखते
जल्दबाजी में चढ़ता चला जो गया
इतना नीचे गिरा देखते देखते
एक आँगन के टुकड़े हुए चार फिर
बाप क्या मर गया देखते देखते
कोई पूछा नहीं सच को बाजार में
झूठ बिक भी गया देखते देखते
हमने कह भी लिया उसने सुन भी लिया
हो गया फैसला देखते देखते
बात कोई वफ़ा की न हमसे करे
खा चुका हूं दगा देखते देखते
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जिसको कहते हैं प्यार पहले था
दिल किसी पे निसार पहले था
अब निगाहों में एक मन्ज़िल है
आप का इंतजार पहले था
अब तलक हैं निशान काँटों के
फूलों से ऐतबार पहले था
लोग अब मयकदों में खोज रहे
इश्क़ में जो ख़ुमार पहले था
हमसे पूछो सबब मुहब्बत का
हमने खोया क़रार पहले था
अब तो दीवार इक बना ली है
मन मेरा आर पार पहले था
रास आती नहीं इसे दुनिया
ज़िस्म ये साज़गार पहले था
अब तो मालुम है उसका चाल-चलन
वो मेरा ग़म गुसार पहले था
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जो लम्हें बीत जाते हैं वो अक्सर याद आते हैं
सफ़र में छूट जाते जो मुसाफ़िर याद आते हैं
ज़ुबाँ को रोक लो साहिब वफ़ा का नाम लेने से
नदी की बात होती है। समन्दर याद आते हैं
कई वादे कई चेहरे बनाकर लोग मिलते हैं
वो जो हमदर्द बनते थे सितमगर याद आते हैं
तहों में कुछ नमीं होगी जहाँ पानी रहा होगा
उतारे पीठ पर तुमनें वो खंज़र याद आते हैं
नहीं था कैमरा कोई मगर तस्वीर होती थी
तुम्हारे साथ वो बचपन के मन्ज़र याद आते हैं
मुहब्बत से मिले हैं ज़िन्दगी को हादसे ऐसे
जरा सा कम न कुछ ज्यादा बराबर याद आते हैं
अदब की महफ़िलों में आज सुनता हूँ लतीफ़े जब
वो जिनकी शायरी थी इल्म सुख़नवर याद आते हैं
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एक ग़लती के बस हम गुनहगार थे
जबकि अच्छे कई मेरे किरदार थे
लोग जितने कभी मेरे हमयार थे
सब के सब आपके ही तलबगार थे
प्यार करके मुझे आज मालुम हुआ
अब तलक जो किये काम बेकार थे
नाम लेकर तेरा पाँव चलते रहे
रास्तों पर कई सुर्ख़ अंगार थे
छुट्टियां खोजते थे कलेण्डर में हम
कितने सुंदर सलोने वो इतवार थे
वो हुए बेवफ़ा किसलिए बेखबर
दिल तो दिल जान देने को तैयार थे
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जा रहे हैं कश्तियों को पार लेकर
हम भँवर में आ गए पतवार लेकर
अस्ल की पहचान ख़ुद करनी पड़ेगी
लोग मिलते हैं यहाँ किरदार लेकर
ज़ख्म देकर ही गया हरबार मूझको
पर न आया वो कभी तलवार लेकर
बात करते हैं अमन की नेकपन की
लोग मन मे जो फिरें दीवार लेकर
उसने ज़ल्फो को बिखेरा क्या हवा में
और बादल आ गए बौछार लेकर
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मेरे बारे में अब सोचता कौन है
हाल बीमार का पूछता कौन है
बात करते हैं सब,अपने मतलब की अब
हक में इंसाफ़ के बोलता कौन है
एक दूजे को देते हैं सब मशविरा
आइना ख़ुद यहाँ देखता कौन है
बाढ़ आई नहीं, है बुलाई गई
देख लो तैरता , डूबता कौन है
हमने चाहा है तुमको ख़ुदा की तरह
आप इंसान हैं तो खुदा कौन है
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तुम्हें देखने का नशा दूसरा था
नज़र ने जो पाया मज़ा दूसरा था
क़दम चल पड़े वो डगर दूसरी थी
मेरी मन्ज़िलों का पता दूसरा था
कई काम हमनें किए नेकियों के
मगर जो मिला वो सिला दूसरा था
मुझे ज़िन्दगी से मिला ये तज़ुर्बा
कहीं गुल खिलाया, खिला दूसरा था
बहुत प्यार है मुझको बेग़म से लेक़िन
तेरे इश्क़ का ज़ायका दूसरा था।
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कुछ मेरी आवारगी में धीरे धीरे लुट गया
दिल तुम्हारी आशिक़ी में धीरे धीरे लुट गया
जीत जाता दुश्मनों से सामना करता अग़र
दोस्त मेरा दोस्ती में धीरे धीरे लुट गया
कुछ नज़र तुमसे मिलाकर डगमगाये उम्रभर
और कोई मयकशी में धीरे धीरे लुट गया
आपको देखा तो दिल में आग चाहत की लगी
एक दरिया तिशनगी में धीरे धीरे लुट गया
प्यार में पागल, जहाँ भर से रहा वो बेख़बर
बे-वफ़ा की बन्दगी में धीरे धीरे लुट गया।
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तेरा दीदार मिलता नहीं आजकल
दिल सँभाले सँभलता नहीं आजकल
देख ली हमने करके गुज़ारिश बहुत
कोई पत्थर पिघलता नहीं आजकल
बे-वजह रात छत पे न जाया करो
चाँद पूरा निकलता नहीं आजकल
सोचते हम रहे रातभर आपको
सोंचकर काम चलता नहीं आजकल
कुछ असर तो तुम्हारी निग़ाहों का है
पीने वाला सँभलता नहीं आजकल
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मुसीबत ज्यों मुसाफ़िर की रवानी आज़माती है
नए क़िरदार को अक्सर कहानी आज़माती है
चमन के हर गुलिस्ताँ की नई ख़ुशबू अता करके
उबलते ख़ून की रंगत जवानी आज़माती है
किसी इक मोड़ पर भटके, भटकते ही रहोगे फिर
सफ़र में मन्ज़िलों तक ज़िन्दगानी आज़माती है
ज़रा ख़ामोश चहरों को भी पढ़ना सीख लेना तुम
सलीके सादगी के बे-ज़बानी आज़माती है
के सीखो सामना करना जहां की हर मसाइल से
हुनर गाहे - बगाहे पासबानी आज़माती है।
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कुछ नमीं आँख की मोतियों में ढली
याद जब आपकी तल्ख़ियों में ढली
आइने कर उठे ज़िक्र फिर आपका
आह फ़िर देर तक सिसकियों में ढली
भूल पाया कहाँ दिल तेरी साज़िशें
उम्र आधी मेरी साज़िशों में ढली
तिनका-तिनका हुआ फूस का घर मेरा
क्यों हवा प्यार की आँधियों में ढली
ऐब जैसे कोई छूटता ही न हो
उस तरह तू मेरी आदतों में ढली।
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मचलते हुए आबशारों से बचना
भँवर से ज़ियादा किनारों से बचना
नया कोई ज़ोखिम उठाता नहीं है
सभी चाहते हैं ख़सारों से बचना
हो मन्ज़र हसीं तो नज़रभर निहारो
जो बदलें मुसलसल नज़ारों से बचना
बसर जैसे-तैसे ही करती ग़रीबी
बशर चाहता है बज़ारों से बचना
ये मिट्टी तुम्हारी अना है सँभालो
हो मुमकिन अग़र तो सितारों से बचना
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जीस्त से मशविरा किया होगा
हादसा यूँ नहीं हुआ होगा
लोग अक़्सर उसे सतातें हैं
लगता वो आदमी भला होगा
भूख तड़पा बहुत रही होगी
उसने तब ज़हर खा लिया होगा
तुम दिवाने नहीं हुए अब तक
इश्क़ पागल नहीं हुआ होगा
नाप लेंगे वही क़दम मन्ज़िल
रास्तों का जिन्हें पता होगा।
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के बढ़ने लगी बेक़सी धीरे -धीरे
ख़फ़ा हो गयी हर ख़ुशी धीरे-धीरे
ये पानी अचानक नहीं सर पे आया
नदी मुश्किलों की चढ़ी धीरे-धीरे
तेरी रहबरी से सबब यह मिला है
हमें आ गयी रहज़नी धीरे-धीरे
सलाख़ों की मुझको हुई जब तमन्ना
सजा हो रही मुल्तवी धीरे-धीरे
निभाते रहे इस तरह दुश्मनी वो
के हो जाये फ़िर दोस्ती धीरे-धीरे
न इस बात का ग़म किसी को यहाँ है
ज़ुदा हो रही ज़िन्दगी धीरे-धीरे
अग़र सच को सच आप लिखते रहेंगे
तो मिट जाएगी हर बदी धीरे-धीरे
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बिन हवा के ये ज़द हुआ कैसे
दीप जलता हुआ बुझा कैसे
सिर्फ़ अपने लिए करोगे तो
काम आख़िर करे दुआ कैसे
एक ही मिट्टी से बने हैं तन
मन से इतने ज़ुदा ज़ुदा कैसे
बात यह क़ब्र ही बताएगी
ज़िन्दगी होती है ख़फ़ा कैसे
इश्क़ वाले ही जान पाते हैं
जीस्त करती है मोजिज़ा कैसे।
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वही बुझ गए जो बुझाने चले थे
कई लोग सच को हराने चले थे
ग़रीबी मिटाने के वादे थे झूठे
वो साहिब तो सत्ता को पाने चले थे
वही खाइयाँ खोदते फिर रहे हैं
जो दीवार-ए-नफ़रत गिराने चले थे
नहीं जानते ख़ुद हुनर तैरने का
वो कश्ती हमारी डुबाने चले थे
क़दम दो क़दम साथ चलतक न पाए
वो जन्मों के वादे निभाने चले थे।
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लौट आओ किसी बहाने से
तुमको देखा नहीं ज़माने से
सिलसिला बढ़ गया ख़यालों का
काम ना चल सका भुलाने से
दिल को थोड़ा बहुत सुकूँ मिलता
उसकी तस्वीर को बनाने से
लोग चहरे को पढ़ समझ लेंगे
बात छिपती कहाँ छिपाने से
ज़िन्दगी से जो डगमगाये थे
लोग सँभले शराब खाने से
दिल की फ़ितरत कमान जैसी है
तीर लौटा नहीं निशाने से
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हम तो लेकर चले थे नमी का हुनर
दोस्तों से मिला दुश्मनी का हुनर
आदमी के लिए काम आए न तो
बे-मुरव्वत है वो आदमी का हुनर
लाख दौलत कमाने से क्या फ़ायदा
ग़र न आया तुम्हें ज़िन्दगी का हुनर
मुद्दतों आग सूरज की सहनी पड़ी
तब मिला चाँद को चाँदनी का हुनर
दिल तो टूटे हज़ारों यहाँ प्यार में
सबने पाया नहीं शायरी का हुनर।
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बड़ी मुश्किल कहानी हो रही है
मिरी बिटिया सयानी हो रही है
खिलें हैं आदमी में रंग ताजे
मग़र दुनियाँ ख़िज़ानी हो रही है
नज़र भर देख लो इन पत्थरों को
यहाँ हर चीज पानी हो रही है
जफ़ा से दोस्ती कर ली ज़िगर ने
या दुश्मन ज़िन्दगानी हो रही है
मुसलसल हो रहे बर्बाद हम ही
हमारी मेज़बानी हो रही है
मैं उसका फ़िर भरोसा कर रहा हूँ
वही ग़लती पुरानी हो रही है।
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चाक गिरेबाँ सीने वाले
सुन ले अर्ज़ मदीने वाले
इक मौज बताकर लौट गई
डूब रहे हैं सफ़ीने वाले
धोखा खाकर मर जाते हैं
जी लेते हैं जीने वाले
क्यों ना बुझती प्यास हमारी
पीते क्या हैं पीने वाले
वो क्या समझें ग़ुरबत मेरी
उसके हाँथ नगीने वाले
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बड़ी दूर तक कोई नाता नहीं है
ये दिल है कि उसको भुलाता नहीं है
उसी मोड़ पर ज़िन्दगी आ खड़ी है
जहाँ कोई ज़ोखिम उठाता नहीं है
फ़क़त रौशनी से गुजारा न होगा
दीया प्रेम का जो जलाता नहीं है
पहुँचता कहाँ है बड़ी मन्ज़िलों तक
हुनर जब तलक चोट खाता नहीं है
मुहब्बत में पगली चली जाएगी फिर
नदी को समन्दर बुलाता नहीं है
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मुहब्बत के सहारे से अदावत याद रखती है
के किसको कब लड़ाना है सियासत याद रखती है
किसे फ़ुर्सत यहां इतनी निभाये रिश्ते-नाते सब
कहाँ किसको मिलाना है ज़रूरत याद रखती है
के धन दौलत से भारी है जिधर पलड़ा तराजू का
उसी इंसाफ की बातें अदालत याद रखती है
नबाबी राजशाहों को बुलन्दी भूल भी जाए
हुनर के हर मुसाफ़िर को मुसीबत याद रखती है
सदाक़त से मुहब्बत की रिफ़ाक़त छीन लेती है
ये दुनियाँ जंग को अक्सर ब-सूरत याद रखती है
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हुश् न में अब सादगी मिलती नहीं
आशिकों में आशिकी मिलती नहीं
सोचकर ही पाँव रखना प्यार में
इस डगर में वापसी मिलती नहीं
कुछ हुनर दीदार का अब सीखिए
हर नज़र को रौशनी मिलती नहीं
ज़िस्म,साँसे धड़कने मिल जाएगीं
हर किसी को ज़िन्दगी मिलती नहीं
डूबती हैं कश्तियाँ सैलाब में
प्यास को अक्सर नदी मिलती नहीं
बज़्म का लहज़ा सुहाना है मग़र
मीर जैसी शायरी मिलती नहीं
जाम पीकर क्या करूँ अब बेख़बर
मयकदों में मयकशी मिलती नहीं।
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मुश्किलों का सामना होगा
रास्ते में और क्या होगा
ना मिली मन्ज़िल मुझे तो क्या
ज़िन्दगी का तज़र्बा होगा
साहिलों पर थोड़ा ज़ोखिम है
फिर समन्दर आपका होगा
मैं भरोसा भी नहीं करता
आदमी है बेवफ़ा होगा
चाहता है अब सुलह करना
चाल दुश्मन तो चला होगा
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झूठ की हर निशानी लिखेगा
वक़्त जब ज़िन्दगानी लिखेगा
बे-वफाओं का मज़मा लगेगा
इश्क़ जब जब जवानी लिखेगा
श्याम को कोई छलिया लिखे भी
प्रेम मीरा दिवानी लिखेगा
याद आ जाएगें हादसे जब
बात कोई पुरानी लिखेगा
हर जगह नाम तेरा ही होगा
दर्द दिल की कहानी लिखेगा
बेख़बर आग से डर गए तो
कौन पानी को पानी लिखेगा।
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दिल नहीं लगता हो तो यार पुराने ढूँढ़ो
ना मिलें यार तो फिर गुज़रे ज़माने ढूँढ़ो
उड़ गए पंछी सभी इस डाल को छोड़ कहीं
तीर से कह दो कहीं और निशाने ढूँढ़ो
झूठ स्वीकार तेरा कर तो लिया है लेकिन
कुछ कुछ सच्चे से लगें ऐसे बहाने ढूँढ़ो
रेत ही रेत है इस उजड़े हुए सहरा में
तुम किसी और समन्दर में खज़ाने ढूँढ़ो
दौर बाज़ार का है काम करे मतलब से
दिल की ख़ातिर अब तुम लोग दिवाने ढूँढ़ो
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नहीं आग की अब कोई दास्तां है
मेरी ज़िन्दगी में धुआं ही धुआं है
कहीं खो गया नेकियों का ज़माना
बड़ा ही सितमगर ये सारा जहां है
कई दर्द दिल में लिए फिर रहा हूँ
न है ज़ख्म कोई न कोई निशां है
के जिस मोड़ पर लोग शामिल हुए थे
उसी मोड़ पर लुट गया कारवां है
कहाँ दूर उससे हुए आज भी हम
भले फ़ासला अब मेरे दरमियाँ है
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हमेशा पास अपने आइना रखना
बुरी चीजों से थोड़ा फ़ासला रखना
न जाने कौन सा, कब काम पड़ जाए
ज़रूरी है सभी से राब्ता रखना
समन्दर के सफ़र पर निकले हो घर से
मिलें ग़र मुश्किलें तो हौसला रखना
किसी से दुश्मनी कितनी भी बढ़ जाए
खुला तुम दोस्ती का रास्ता रखना
नज़ारत की ज़रूरत है मुहब्बत में
मनाने रूठने का सिलसिला रखना
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दर्दए-ग़म बेक़सी बेबसी आयी है
अपने हिस्से कहाँ ज़िन्दगी आयी है
मुद्दतों बाद उनसे निगाहें मिलीं
आज आँखों में फिर से नमीं आयी है
रौशनी का हवाला दिया था हमें
छत पे थोड़ी-बहुत चाँदनी आयी है
महज़ पानी से होगा गुज़ारा न अब
भूख लेकर बहुत तिशनगी आयी है
नेकियों का सबब मुश्किलें दे रहा
मुश्किलों से हमें शायरी आयी है।
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चाँद की चाँदनी सब नहीं चाहिए
अपने हिस्से की बस रौशनी चाहिए
ग़र हुनर ख़्वाब देखे, तो भी ठीक था
ज़िन्दगी बे-हुनर को हसीं चाहिए
दोस्ती बन्दगी या करे दुश्मनी
पाक ईमान का आदमी चाहिए।
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साज़िशों को हादसा पैहम बताया जा रहा
खून सड़को पर सियासी अब बहाया जा रहा
घर जलाए फिर कहीं पर रौशनी के नाम पर
वोट ख़ातिर फ़िर कहीं आवास बाटा जा रहा
चाटुकारों को मिली सरकार की हर योजना
जो सही हकदार थे उनको सताया जा रहा
अज़नबीयों से नए रिश्ते निकाले जा रहे
भाई-भाई को यहाँ दुश्मन बनाया जा रहे
पूँजीवादी लोग जबसे आए हैं सरकार में
फिर ग़रीबों पर बख़ूबी ज़ुल्म ढाया जा रहा
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मुल्क़ की बर्बादियों का काम करती हस्तियाँ
भूख की ज़द में यहाँ हैं ढेर सारी बस्तियाँ
आग की बुनियाद पर कैसे खिलेंगे फूल अब
आदमी ने ख़ुद उठाईं नफ़रतों की आँधियां
खिलखिलाहट से भरे आँगन सुहाने ना रहे
ना रहे देवर जी वैसे ना रहीं अब भाभियाँ
लूटकर अस्मत लुटेरे आ गए सरकार में
खौफ़ में अब जी रहीं हैं आजकल की बेटियाँ
नेकियों के नाम पर ,होती सियासत बेख़बर
हर सियासी भर रहा है मज़हबों में तल्खियाँ
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पर्वतों पर हम नया परचम लगाकर आए हैं
पत्थरों के सामने शीशे लगाकर आए हैं
जो हमारी पीठ पर ख़ंजर चुभाने आया था
हम उसी के ज़ख्म पर मरहम लगाकर आए हैं
हम भले भटके बहुत ,इन रास्तों पर उम्रभर
अपने बच्चों के लिए मन्ज़िल उठाकर लाए हैं
आज मेरे साथ है जो कारवाँ मत देखिए
मुश्किलों की ज़िन्दगी तनहा बिताकर आए हैं
यूँ नहीं इस पार आकर हम खड़े हैं बेख़बर
धार में मझधार का ज़ोखिम उठाकर आए हैं
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बड़ी ज़ालिम हुक़ूमत है अदावत मार डालेगी
तुम्हें भी झूठ कहना है सदाक़त मार डालेगी
नहीं सुनता ग़रीबों की कोई थाना कचहरी में
अग़र इंसाफ़ माँगोगे अदालत मार डालेगी
कई पर्दों के पीछे से, सियासी ज़ुल्म करता है
जियो सहते हुए वरना सियासत मार डालेगी
फ़रेबी हुश्न वाले इश्क़ का व्यापार करते हैं
नए ताज़िर को उल्फ़त की तिज़ारत मार डालेगी
बुढ़ापा बोझ लगता हैं कहीं माँ-बाप का अपने
कहीं बेबा को बच्चों की ज़रूरत मार डालेगी
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झूठ कहें ये सच के जैसे
लोग मिले हैं कैसे कैसे
जान हमारी ले लो चाहें
हम ना होंगे तेरे जैसे
जाने वाले मत सोंचो तुम
जी लेंगे हम जैसे तैसे
वक़्त न जाने क्या कर डाले
काम न करना ऐसे वैसे
हम फूल नहीं, इक ख़ुश्बू हैं
मिट जायेगें ऐसे कैसे
मन्ज़िल के साथ ही सोंचो
नापोगे तुम रस्ते कैसे
नाम के हैं अब रिश्ते-नाते
सब करते हैं पैसे पैसे।
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वही आलम है वर्षों से घराना क्या गरीबों का
भटकना ही मुक़द्दर है ठिकाना क्या गरीबों का
के पापी पेट के ख़ातिर बनें मज़दूर फिरते हैं
ज़मीं की धूल हैं साहिब, ज़माना क्या गरीबों का
अमीरों की सियासत नें, किया शोषण बहाने से
लुटे हों ख़्वाब जिनके, मुस्कराना क्या गरीबों का
न रोटी है न कपड़ा है, शिक्षा की बात छोड़ो तुम
के बहरों को सुनाएं हम, फ़साना क्या गरीबों का
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झूठ की बात छिप नहीं सकती
बात निकली तो रुक नहीं सकती
पानी बादल बने , बरस जाए
आग से आग ,बुझ नहीं सकती
अपनी रफ़्तार ख़ुद बढ़ा लो तुम
वक़्त की चाल ,रुक नहीं सकती
ग़र नहीं बाँध , तुम बना सकते
बहती धारा बदल नहीं सकती
हस्ती अपनी हुनर के दम से है
इतनी जल्दी ये मिट नहीं सकती
0
पीने का इंतज़ाम सारा कर लिया
इश्क़ उनसे फिर दुबारा कर लिया
आज महफ़िल ढूंढती है हर ख़ुशी
दर्द नें तन्हा गुज़ारा कर लिया
आपका हो फ़ायदा, बस इसलिए
हमने ख़ुद अपना, ख़सारा कर लिया
दुश्मनों से बाजियां फिर जीत लीं
दोस्तों से जब किनारा कर लिया
मुस्कराहट देख अपने बेटे की
हमने ज़न्नत का नज़ारा कर लिया।
0
सो रहे फुटपाथ पर कुछ आशियानों के लिए
लोग लाखों दर-बदर हैं चार-दानों के लिए
स्कूल पढ़ने जाएं बच्चे, दाल-रोटी खाएं सब
वालिदों नें ज़िन्दगी दी, कारखानों के लिए
मुल्क़ के बनकर मुलाज़िम आये थे बाज़ार में
नौकरी करते हैं साहिब बेईमानों के लिए
बेसबब सी ख़्वाहिशें , बेज़ार ना कर दें तुम्हें
छोड़ मत देना ज़मीं , उन आसमानों के लिए
आज सच के साथ तुम आये नहीं तो बेख़बर
कौन फ़िर आवाज़ देगा बे-ज़ुबानों के लिए।
0
उसनें समझा खार लिए हैं
हम फूलों का हार लिए हैं
खा जाती हैं आँखें धोखा
लोग कई किरदार लिए हैं
इश्क़ का हमसे हाल न पूछो
तीर ज़िगर के पार लिए हैं
खौफ़ किसे मझधार का तेरी
हम भी इक पतवार लिए हैं
प्यार का पाठ पढ़ाने वाले
लोग यहाँ औज़ार लिए हैं
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मुन्सिफ़ों का इतना सस्ता दाम है
बे-गुनाह पे क़त्ल का इल्ज़ाम है
हर तरफ़ पतझर नज़र आया हमें
गुल तेरा, गुलशन कहाँ गुलफ़ाम है
आदमी का खून पीता आदमी
मयकदा तो मुफ़्त में बदनाम है
ज़िस्म का परचम ज़माने भर में है
मन का सूरज आज भी गुमनाम है
मुश्किलों का नाम है इक ज़िन्दगी
क़ब्र वालों को फ़क़त आराम है।
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पाल बैठा कई अरमान शायद
दिल तेरा है अभी नादान शायद
सच को मिलता कहाँ इंसाफ सच्चा
बिक चुके हैं सभी मीज़ान शायद
सूना-सूना सा है आलम ये सारा
आ चुका है कोई तूफ़ान शायद
सुन ख़बर,क़त्ल की सहमें न धड़कन
आदमी हो गया बे-ज़ान शायद
वो कई रोज़ से ख़ामोश है अब
हो चुकी ख़त्म, हर इम्कान शायद
मुद्दतों ख़्वाब को तरसें निग़ाहें
दिल मेरा हो गया वीरान शायद
दिन में छाने लगा हर-सू अँधेरा
बुझ चुके हैं सभी लोबान शायद
0
सौदेबाज़ी चल रही सरकार में
लोग उलझे फिर रहे बेकार में
चार पैसे क्या दिखे, बिकने लगे
लालची जो लोग थे बाज़ार में
पानियों के शहर जाने के लिए
पाँव कितने चल चुके अंगार में
चाँद को ताकेँ,भला हम किसलिए
चैन आता जब तेरे दीदार में
बस वफ़ा काफ़ी है चाहत के लिए
खामियाँ क्या देखते किरदार में
बात से इनकार होगा, और क्या
देर मत करना कभी इज़हार में
साहिलों ने साथ छोड़ा बेख़बर
कश्तियाँ डूबी कहाँ मझधार में।
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पहले इक दीवार बनाई जाएगी
फिर झगड़े की बात उठाई जाएगी
इक दो घर में छप्पर रक्खें जाएगें
फिर बस्ती में आग लगाई जाएगी
बूदों का छिड़काव कराया जाएगा
टी.वी. पर बरसात दिखाई जाएगी
फिर साँपों को दूध पिलाया जाएगा
आस्तीनों की प्यास बुझाई जाएगी
ज़ुल्म मुसलसल जारी है इस मुल्क़ में
आख़िर कब तलवार उठाई जाएगी।
0
आदमीयत से सारा जहाँ दूर है
किस नशे में यहाँ आदमी चूर है
साथ देता नहीं कोई कमज़ोर का
लूट लेना बना आज दस्तूर है
एक तबक़ा वतन में रईशों का है
एक तबक़ा ग़रीबी से मज़बूर है
बेच दी रौशनी, चाटुकारों को सब
नेकियों का नगर आज बे-नूर है
छोड़ दो आप मरहम लगाना इसे
हो चुका ज़ख़्म दिल का ये नासूर है
तोड़ना चाहता दर्द अपनी हदें
हादसों से मेरा हाल मंशूर है
ज़िक्र करता नहीं,आसमाँ पर कोई
इस ज़मीं पर, बड़ा चाँद मशहूर है
0
दुनियां का जबसे हर चलन बाज़ार हो गया
झूठा बहुत इन्सान का किरदार हो गया
देखो जिसे मशरूफ़ है दौलत की होड़ में
जीना यहाँ ईमान से दुश्वार हो गया
अब तो तुम्हारे नाम से होने लगे सितम
वहशी बहुत मौला तेरा संसार हो गया
पैरों तले रौंदी हुई , कलियों को देखकर
जो शख़्स पहले फूल था खार हो गया
रस्ते कहाँ दुश्वार थे मन्ज़िल के बेख़बर
अब आदमी की ,आदमी दीवार हो गया।
0
चादर और बढ़ाया जाए
पैरों को पसराया जाए
चल, हाँथ हतौड़ा छेनी है
पर्वत आज झुकाया जाए
बात सुने, संसद हम सबकी
जोर से यदि चिल्लाया जाए
गुल के पीछे दौड़ रहे सब
पतझड़ कोई खिलाया जाए
ढूंढ निशाना पहले अपना
तीर कहाँ तक जाया जाए
प्यार तुम्हारा ज़ालिम इतना
ना खोया , ना पाया जाए
0
ज़िस्म-जाँ ,धड़कन में चलता ,बस फ़साना आपका
दिल हमारा बन चुका है कारखाना आपका
अह हवा उनको बता दे आशिकी क्या चीज है
नाम लेकर जी रहा है इक दिवाना आपका
एक दिन आकर सड़क पर, बेवज़ह आँसू बहा
शहर में छाया हुआ है मुस्कराना आपका
चाहने वाले तुम्हारे बढ़ रहे हैं इस क़दर
एक दिन हो जाएगा सारा ज़माना आपका
उम्रभर भटके बहुत इस ज़ुस्तज़ू में बेख़बर
मिल न पाया आज़तक हमको ठिकाना आपका
0
बहुत है आदमी लाचार आख़िर कौन रोकेगा
लुटेरी हो गई सरकार आख़िर कौन रोकेगा
यहाँ बादल समन्दर में बरसते हैं हुक़ूमत के
ज़मीं पर आग की बौछार आख़िर कौन रोकेगा
खनक सुनकर सुनाए जब अदालत फ़ैसले अपनें
के बढ़ता रोज भ्रष्टाचार आख़िर कौन रोकेगा
उगी नफ़रत, जली मूरत , हुआ दंगा, गई जानें
बना मज़हब ,यहाँ बाज़ार आख़िर कौन रोकेगा
कभी मिलने नहीं देते मुहब्बत को मुहब्बत से
बुरे करते खड़ी दीवार आख़िर कौन रोकेगा
करे झूठा भरे सच्चा, फिरा करता नकाबों में
बदलता आदमी किरदार आख़िर कौन रोकेगा।
0
ज़ख़्म पर मरहम लगा सकते नहीं
उसको ऐसे हम भुला सकते नहीं
कह रहे पर्वत उठाकर लाएंगे
लोग जो पत्थर उठा सकते नहीं
दोस्तों से ना मिला धोखा अग़र
ख़ाक में दुश्मन मिला सकते नहीं
बात सब अपनी मनाना चाहते
एक वादा जो निभा सकते नहीं
दूसरों का क्यों उठाने चल दिए
बोझ जब अपना उठा सकते नहीं
साथ चलना सीख लो तुम बेख़बर
वक़्त पर पहरे लगा सकते नहीं।
0
थामा था जिनको छूट गए
सब ख़्वाब हमारे टूट गए
हमनें सुना दरिया वाले थे
जो लोग समन्दर लूट गए
पाँव ने रस्ता ढूंढ़ निकाला
जब छाले होकर फूट गए
उतनी नफ़रत तो जायज़ हो
दिल जितने प्यार में टूट गए
काम न आई कोशिश अपनी
जब बिन कारण वो रूठ गए
0
रास्तों को आज़माना सीखिए
कुछ तो मन्ज़िल का फ़साना सीखिए
कब तलक माँझी रहेगा साथ में
कश्तियाँ ख़ुद से चलाना सीखिए
दिल लगाने का हुनर आ जाएगा
आप नज़रें तो मिलाना सीखिए
खेलने का शौक़ है बारूद से
आग का ज़ोखिम उठाना सीखिए
बात बिगड़ी है मग़र बन जाएगी
प्यार से मिलना-मिलाना सीखिए
कौन जाने , लौट जाए खुद-ब खुद
मुश्किलों को आज़माना सीखिए
मन कहीं लगता नहीं तो बेख़बर
इश्क़ का कोई तराना सीखिए
0
अब तो रहने लगे दूर ख़्वाबों से हम
हर दफ़ा चोंट खाये नकाबों से हम
तीर ,तलवार से अब गिला क्या करें
इतना छलनी हुए हैं गुलाबों से हम
इन सवालों से थोड़ी सी उम्मीद थी
फ़िर परेशां हुए सुन, ज़बाबों से हम
सामना इक हक़ीक़त से क्या हो गया
ना निकल पाए अब तक सराबों से हम
अब मचाये हैं आतंक लिक्खे-पढ़े
आदमी बन सके ना किताबों से हम
हम फ़क़ीरों पे कर कुछ रहम ज़िन्दगी
मिट न जाएं कहीं इन अज़ाबों से हम।
0
नीतियां कौम-वादी चलाये सियासत
रोज सौगन्ध समता की खाये सियासत
अब धनी वर्ग से मिलके व्यापार करती
आम जनता को पागल बनाये सियासत
क्या अदालत, कचहरी, ये थाना सिपाही
फैसले एक तरफा सुनाये सियासत
तीरगी को मिटाने की बातें करेगी
और फ़िर रौशनी, बेच खाये सियासत
भ्रष्ट शासन, चले दफ़्तरों में दलाली
इसको ईमानदारी बताये सियासत।
0
नज़ारे नज़र को जो नम याद आए
मुहब्बत के सारे सितम याद आए
कोई गा रहा था अना पत्थरों की
बड़ी देर तक फिर सनम याद आए
कहे दिल करो मत भरोसा की बातें
वो वादे फ़रेबी कसम याद आए
महज़ सोंचकर देखा इक दिन ख़ुशी को
मुसलसल हमें रोज ग़म याद आए
हुआ सामना जब हकीकत से यारों
सुहाने सुहाने भरम याद आए
0
हम हुए ना तेरे मुस्तहक़ आजतक
है यही अपने दिल में कसक आजतक,
इस नज़र नें जहाँ, देख डाले कई
बस तुम्हारी बसी है ,झलक आजतक
वक़्त अपना बिताकर, चले जाते सब
दोस्तों से मिला ये, सबक आजतक
नाम क्या लिख दिया था तुम्हारा कभी
डायरी के महकते , वरक़ आजतक
इस तरह ख़्वाब, टूटे मेरे बेख़बर
आँख से बह रहा है अरक़ आजतक।
0
चल रही, मतलब से दुनियां, बन्दगी को भूल जा
दर्द ही अब ज़िन्दगी है, तू ख़ुशी को भूल जा
वक़्त की बरबादियाँ , पायीं सदा ही प्यार ने
काम धन्धा देख अपना, दिलनशी को भूल जा
हर तरफ़ हैं आँधियां, मुश्किल चराग़ों को हुई
तीरगी में सीख चलना, रौशनी को भूल जा
यार कुछ दिलदार थे,पर बात वो बचपन कि थी
मत समझ दुश्मन उन्हें , पर दोस्ती को भूल जा
यदि उठा सकते नहीं,आवाज़ तुम मज़लूम की
शेर लिखना छोड़ दे, औ शायरी को भूल जा।
0
ज़ख़्म पर मरहम लगा सकते नहीं
उसको ऐसे हम भुला सकते नहीं
कह रहे पर्वत उठाकर लाएंगे
लोग जो पत्थर उठा सकते नहीं
दोस्तों से ना मिला धोखा अग़र
ख़ाक में दुश्मन मिला सकते नहीं
बात सब अपनी मनाना चाहते
एक वादा जो निभा सकते नहीं
दूसरों का क्यों उठाने चल दिए
बोझ जब अपना उठा सकते नहीं
साथ चलना सीख लो तुम बेख़बर
वक़्त पर पहरे लगा सकते नहीं।
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थामा था जिनको छूट गए
सब ख़्वाब हमारे टूट गए
हमनें सुना दरिया वाले थे
जो लोग समन्दर लूट गए
पाँव ने रस्ता ढूंढ़ निकाला
जब छाले होकर फूट गए
उतनी नफ़रत तो जायज़ हो
दिल जितने प्यार में टूट गए
काम न आई कोशिश अपनी
जब बिन कारण वो रूठ गए
0
रास्तों को आज़माना सीखिए
कुछ तो मन्ज़िल का फ़साना सीखिए
कब तलक माँझी रहेगा साथ में
कश्तियाँ ख़ुद से चलाना सीखिए
दिल लगाने का हुनर आ जाएगा
आप नज़रें तो मिलाना सीखिए
खेलने का शौक़ है बारूद से
आग का ज़ोखिम उठाना सीखिए
बात बिगड़ी है मग़र बन जाएगी
प्यार से मिलना-मिलाना सीखिए
कौन जाने , लौट जाए खुद-ब खुद
मुश्किलों को आज़माना सीखिए
मन कहीं लगता नहीं तो बेख़बर
इश्क़ का कोई तराना सीखिए
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अब तो रहने लगे दूर ख़्वाबों से हम
हर दफ़ा चोंट खाये नकाबों से हम
तीर ,तलवार से अब गिला क्या करें
इतना छलनी हुए हैं गुलाबों से हम
इन सवालों से थोड़ी सी उम्मीद थी
फ़िर परेशां हुए सुन, ज़बाबों से हम
सामना इक हक़ीक़त से क्या हो गया
ना निकल पाए अब तक सराबों से हम
अब मचाये हैं आतंक लिक्खे-पढ़े
आदमी बन सके ना किताबों से हम
हम फ़क़ीरों पे कर कुछ रहम ज़िन्दगी
मिट न जाएं कहीं इन अज़ाबों से हम।
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नीतियां कौम-वादी चलाये सियासत
रोज सौगन्ध समता की खाये सियासत
अब धनी वर्ग से मिलके व्यापार करती
आम जनता को पागल बनाये सियासत
क्या अदालत, कचहरी, ये थाना सिपाही
फैसले एक तरफा सुनाये सियासत
तीरगी को मिटाने की बातें करेगी
और फ़िर रौशनी, बेच खाये सियासत
भ्रष्ट शासन, चले दफ़्तरों में दलाली
इसको ईमानदारी बताये सियासत।
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नज़ारे नज़र को जो नम याद आए
मुहब्बत के सारे सितम याद आए
कोई गा रहा था अना पत्थरों की
बड़ी देर तक फिर सनम याद आए
कहे दिल करो मत भरोसा की बातें
वो वादे फ़रेबी कसम याद आए
महज़ सोंचकर देखा इक दिन ख़ुशी को
मुसलसल हमें रोज ग़म याद आए
हुआ सामना जब हकीकत से यारों
सुहाने सुहाने भरम याद आए
0
हम हुए ना तेरे मुस्तहक़ आजतक
है यही अपने दिल में कसक आजतक,
इस नज़र नें जहाँ, देख डाले कई
बस तुम्हारी बसी है ,झलक आजतक
वक़्त अपना बिताकर, चले जाते सब
दोस्तों से मिला ये, सबक आजतक
नाम क्या लिख दिया था तुम्हारा कभी
डायरी के महकते , वरक़ आजतक
इस तरह ख़्वाब, टूटे मेरे बेख़बर
आँख से बह रहा है अरक़ आजतक।
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चल रही, मतलब से दुनियां, बन्दगी को भूल जा
दर्द ही अब ज़िन्दगी है, तू ख़ुशी को भूल जा
वक़्त की बरबादियाँ , पायीं सदा ही प्यार ने
काम धन्धा देख अपना, दिलनशी को भूल जा
हर तरफ़ हैं आँधियां, मुश्किल चराग़ों को हुई
तीरगी में सीख चलना, रौशनी को भूल जा
यार कुछ दिलदार थे,पर बात वो बचपन कि थी
मत समझ दुश्मन उन्हें , पर दोस्ती को भूल जा
यदि उठा सकते नहीं,आवाज़ तुम मज़लूम की
शेर लिखना छोड़ दे, औ शायरी को भूल जा।
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मत करो यारों भरोसा आज के इंसान का
लूट लेगा ,नाम लेकर आपको भगवान का,
नेक दिल,अच्छे सलीक़े,सब तुम्हें मिल जाएंगे
खोजने से , ना मिलेगा ,आदमी ईमान का
बेवज़ह क्या सोचना,उस पार जाना है अगर
आपको करना पड़ेगा, सामना तूफ़ान का
ना हुनर ,ना नेकियाँ, ख़्वाहिश बलन्दी की करें
हर कोई भूखा बहुत है, खल्क में पहचान का
प्यार क्या, इज़हार क्या, तन्हा गुज़ारी ज़िन्दगी
बेवज़ह ख़तरा उठाये कौन अपनी जान का।
0
पाँव पानी से यहाँ, जलने लगे
लोग तबसे आग पर चलने लगे
चार पैसे हम कमाने क्या लगे
लोग अपने ही बहुत ,जलने लगे
और ऊपर हम कहाँ, उठ पाएंगे
जिनको चढ़ना था ,वही ढलने लगे
हो रहे सारे शज़र ज़र्ज़र कहीं
फूल साखों पर, कहीं खिलने लगे
कौन दे इंसाफ़ अब मज़लूम को
रिशवतों से फैसले टलने लगे।
0
दर-बदर ही फ़िराती रही रातदिन
ज़िन्दगी आज़माती रही रातदिन
हमने ज़ख्मों पे मरहम लगा तो लिया
याद दिल को दुखाती रही रातदिन
तैरने का हुनर , काम आता रहा
दुनिया कश्ती डुबाती, रही रातदिन
बदली सरकार से थोड़ी उम्मीद थी
भूख पर लड़खड़ाती रही रातदिन
दर्द में उम्र सारी कटी बेख़बर
बद-नसीबी सताती रही रातदिन।
0
क्या करूँ प्यास के हवालों का
जब ठिकाना नहीं निवालों का
तीरगी पर क़सूर डाला है
ज़ुर्म था आज फ़िर उजालों का
इश्क़ ही जब, भुला दिया तुमनें
कोई मतलब नहीं ख़यालों का
हर क़दम का हिसाब मिल जाए
दर्द समझों किसी के छालों का
हर्फ़-दर-हर्फ़ तुम नज़र आओ
ज़िन्दगी क्या करे रिसालों का
0
नहीं ढूंढ़ पाए ,नदी के किनारे
भँवर में फसें हैं सफीने हमारे
मेरे आसमाँ में, कहाँ चाँद आया
रहे ताकतें रातभर, हम सितारे
अँधेरों ने हमको,सिखाया है चलना
नहीं मिल सके रौशनी के सहारे
न मन्ज़र हसीं कोई तुमको मिलेगा
नज़र को बनाने पड़ेंगे नज़ारे
अचानक नहीं,कारवाँ बन गया, ये
कई साल हमनें भी तनहा गुज़ारे
0
रहज़नों सी रहबरी है और सब कुछ ठीक है
मुश्किलों में ज़िन्दगी है और सब कुछ ठीक है
रौशनी का नाम लेकर , छीन लेते नूर सब
हर तरफ़ बस तीरगी है, और सब कुछ ठीक है
छोटी-छोटी बात पर झगड़े हमारे हो गए
दोस्तों से दुश्मनी है, और सब कुछ ठीक है
प्यास ने मारा कहीं पर, बाढ़ से बेहाल हैं
आब अब तो आतिशी है,और सब कुछ ठीक है
भ्रष्ट नेता कर रहे , गन्दी सियासत बेख़बर
दहशतों में आदमी है, और सब कुछ ठीक है।
0
सुब्ह तुम्हारा शाम तुम्हारा
लब पे हमारे जाम तुम्हारा,
सूरत कब की भूल चुका हूँ
याद रहा बस नाम तुम्हारा,
प्यार को ज़ुर्म ,कर दो घोषित
सच हो ,तब इल्ज़ाम तुम्हारा,
आँखे रस्ता देख रही हैं
ना , आया पैग़ाम तुम्हारा,
हम तो अपनी जान भी दे दें
बन जाए, ग़र काम तुम्हारा
0
तब कहीं खुशबुओं के फ़साने होगें
गुल तुम्हें , शाख पर खुद खिलाने होगें
दिन अचानक किसी के बदलते नहीं
अब क़दम मुश्किलों में बढ़ाने होगें
ना मिटेगा अँधेरा, किसी एक से
दीप मिलकर सभी को जलाने होगें
क्या करोगे बनाकर नई बस्तियाँ
क़ल्ब उजड़े हुए भी बसाने होगें
पोखरों से न होगी बसर बेख़बर
नाव को अब समन्दर दिखाने होगें।
0
नेक दिखने में सारा जहाँ चूर है
नेकियों से बहुत आदमी दूर है
कोई करता है काली कमाई बहुत
रोटियों के लिए , कोई मज़बूर है
शहर क्या,ज़िस्म-जाँ तक अँधेरों में है
मुश्किलों में फसा आज का नूर है
प्यास मरती रहे , कोई पानी न दे
अब ज़माना बड़ा बेरहम क्रूर है
आदमी को अलग आदमी से करे
मज़हबों का यही , आज दस्तूर है
0
सीखते हर पल रहो , कुछ पैतरे तलवार के
कोशिशें फ़िर से करो, बैठो नहीं तुम हार के
कश्तियाँ अपनी सँभालों ,अपनी ही पतवार से
बच के निकलो,साहिलों से,दिन गए मझधार के
साएदारी, बाप-दादा से नहीं , मुझको मिली
पाँव ने देखे बहुत हैं, रास्ते अंगार के
होगा कुछ सस्ता नहीं ,पैसे कमाना सीखिए
भाव बढ़ते ही रहेंगे , रोज अब बाज़ार के
काटतीं , तन्हाइयों में कतरा-कतरा रूह का
दाँत भी होने लगे हैं ,आजकल दीवार के।
0
याद आती है तुम्हारी तो नशा होता है
याद आये न तुम्हारी तो नशा होता है
ग़र तुम्हें ना देखूँ तो बेचैन रहें हम
दीद हो जाए तुम्हारी तो नशा होता है
रूठ जाती है ज़ुबाँ, ज़िक्र नहीं करता तो
जब करूँ बात तुम्हारी तो नशा होता है
0
अँधेरों का दामन बढ़ाओ न साहब
दीया जल रहा है बुझाओ न साहब
रहम कीजिए कुछ मदत ना करो तो
ग़रीबों को ज़्यादा सताओ न साहब
पसीना बहाते हैं रोटी के ख़ातिर
लहू तुम हमारा बहाओ न साहब
समझता नहीं ,आदमी कोई हमको
हमें मज़हबी अब बनाओ न साहब
कहीं खुदखुशी कर न ,लें बेबसी में
क़हर इस क़दर रोज ढाओ न साहब।
0
ये कश्ती समन्दर में उतारा करें
चलो अब किनारों से किनारा करें
मुकर जाते हो तुम अपनी ही बात पर
कहाँ तक भरोसा हम तुम्हारा करें
सरे-राह तुमको रोज आवाज़ दी
कभी आप भी हमको पुकारा करें
हुनर ढूंढ ले शायद कोई रास्ता
चलो इक दफ़ा कोशिश , दुबारा करें
नज़र चाहती है देखना आपको
तसव्वुर से कितना हम गुज़ारा करें
0
के अब कारवाँ का ज़माना नहीं है
सफ़र मंज़िलों का सुहाना नहीं है
तुम्हें भी ज़रा सा कमाना पड़ेगा
मेरे पास कोई खज़ाना नहीं है
शज़र कट रहे हैं ,ज़मीं पर मुसलसल
परिन्दों का कोई ठिकाना नहीं है
के जोड़े हुए है ज़रूरत सभी को
तअल्लुक किसी को निभाना नहीं है
सबब मिल चुका है मुहब्बत का हमकों
कहीं दिल हमें अब लगाना नहीं हैं
0
बाहरी मुस्कान भीतर रो रहा है आदमी
बोझ अपनी ज़िन्दगी का ढो रहा है आदमी
बेवज़ह की बात पर, करता सियासत रातदिन
बीज नफ़रत के यहाँ,अब बो रहा है आदमी
मस्लहत की भावना,मन में बिठाकर किसलिए
ज़िस्म गंगा में मुसलसल धो रहा है आदमी
चन्द पैसों के लिए ,ये बेच दे ईमान को
नेकियों के रास्तों से खो रहा है आदमी
भूलकर बुनियाद की सारी हक़ीक़त बेख़बर
झूठे-सच्चे ख़्वाब लेकर सो रहा है आदमी
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बाहरी मुस्कान भीतर रो रहा है आदमी
बोझ अपनी ज़िन्दगी का ढो रहा है आदमी
बेसबब की बात पर, करता सियासत रातदिन
बीज नफ़रत के यहाँ,अब बो रहा है आदमी
मस्लहत की भावना,मन में बिठाकर किसलिए
ज़िस्म गंगा में मुसलसल धो रहा है आदमी
चन्द पैसों के लिए ,ये बेच दे ईमान को
नेकियों के रास्तों से खो रहा है आदमी
भूलकर बुनियाद की सारी हक़ीक़त बेख़बर
झूठे-सच्चे ख़्वाब लेकर सो रहा है आदमी
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सच की बेबस बहुत नेकियाँ हैं यहाँ
हर तरफ़ झूठ की सुर्खियाँ हैं यहाँ
लोग तामीर करने लगे तीरगी
दीप कैसे जले आँधियाँ हैं यहाँ
धर्म के नाम पर मत सियासत करो
भूख से जल रहीं बस्तियाँ हैं यहाँ
रोज आती ख़बर अब बल्तकार की
खौफ़ में जी रही बेटियाँ हैं यहाँ
बन गए लोग छोटे , बड़े बेख़बर
एक जैसी सभी रोटियाँ हैं यहाँ।
0
चन्द लम्हों के लिए ज़ोखिम उठाकर देखिए
पत्थरों के सामने शीशे लगाकर देखिए
साहिलों से कब तलक़ तकते रहोगे दूर तक
कश्तियाँ अपनी भँवर के बीच लाकर देखिए
उठना-गिरना फिर सँभलना जीस्त का दस्तूर है
मुश्किलों से आप थोड़ा दिल लगाकर देखिए
मील का पत्थर मिलेगा यदि नहीं मंज़िल मिली
रास्तों पर और थोड़ा दूर जाकर देखिए
ख़्वाब देखो फिर नए दुनियाँ पड़ी है सामने
बीत जो लम्हा गया उसको भुलाकर देखिए।
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शहर भर जानता है फ़साने तेरे
एक हम ही नहीं थे दिवाने तेरे
किसलिए बुन रहे हो नई साजिशें
वाक़िये तो बहुत हैं पुराने तेरे
बात सच सच बता दो,है क्या मसअला
अच्छे लगते नहीं अब बहाने तेरे
ठौर कब तक बदलते फिरोगे यहाँ
ढूंढ लेंगे किसी दिन ठिकाने तेरे
उम्रभर ज़ख़्म भरते नहीं बेख़बर
वार करते नज़र के निशाने तेरे
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आओ मिलाएं नज़र से नज़र
ख़ामोशियाँ से ना होगी बसर
ना डूबता फिर सफ़ीना मेरा
पतवार का साथ होता अग़र
छाया हुआ है अँधेरा घना
होगा चराग़ों का कितना असर
यादें तुम्हारी तो जानती
कब नींद आई हमें रातभर
दे दे ख़ुदा अब ठिकाना मुझे
फिरता रहूँ कब तलक दर-बदर
पाई नहीं कोई मंज़िल तो क्या
पा जानते हैं हमारे सफ़र
0
फ़ेके सत्ता नें पैसे चार
सबसे पहले बिका अखबार
बनके जनता के सेवक आज
सब नेता करते कारोबार
सत्ता का बस करो गुणगान
गाड़ी बंगला मिलेगी कार
पूंजीपतियों को बिकेगा देश
संसद अब हो गई बाज़ार
जिसके हिस्से में थी बरसात
पाई उसने महज़ बौछार
0
कैसे बताएं किस तरह बदनाम हम हुए
उसको जिताते रह गए नाकाम हम हुए
पहले बहुत ये ज़िन्दगी मसरूफ़ थी यहाँ
दिल को लगा के आपसे बेकाम हम हुए
मुझको अकेला छोड़कर क्यों जा रहे हो तुम
सूरज बने तेरे लिए फिर शाम हम हुए
मंज़िल मुझे न मिल सकी ,रस्ते हुए खफ़ा
ऐसे किसी के प्यार में गुमनाम हम हुए
लगती हुई वो बोलियाँ बस देखता रहा
कल फिर उसी बाज़ार में नीलाम हम हुए
0
रिश्ता आबाद ,बर्बाद कर लें
आइए आज संवाद कर लें
क़ैद लगने लगे जब मुहब्बत
एक-दूजे को आज़ाद कर लें
तुम किसी और को साद कर लो
हम किसी और को साद कर लें
जान ले लो,मग़र थोड़ा ठहरो
इक दफ़ा हम उसे याद लें
बाद बर्बाद उसको करेंगे
पहले ख़ुद को तो,बर्बाद कर ले
0
वो नहीं लौटकर कभी आए
ग़म के मन्ज़र बदल नहीं पाए
प्यास हो और मिल नदी जाए
काश ऐसी कोई घड़ी आए
ज़ख्म खाता रहे ज़िगर कब तक
इक़ मुसीबत अब बड़ी आए
उम्र गुज़री उसी की यादों में
याद तक हम जिसे नहीं आए
साथ कैसे चलें तुम्हारे हम
साथ देने न तुम कभी। आए।
0
नफ़रतों की भावना तुम भर रहे हो किसलिए
दिन ब दिन गन्दी सियासत कर रहे हो किसलिए
देखना है देश को किसकी तरक़्क़ी हो रही
फण्ड कर दो पारदर्शी डर रहे हो किसलिए
दे नहीं सकते सहारा तो हुक़ूमत छोड़ दो
प्राण जनता के यहाँ तुम हर। रहे हो। किसलिए
पहले भी तुमनें किए थे , ना आज़तक पूरे हुए
फ़िर वही वादे फ़रेबी कर रहे हो किसलिए।
0
सियासत के चलते यहाँ लुट गए
मुहब्बत के सब कारवाँ लुट गए
दिले - दर्द कैसे सुनाएं तुम्हें
के हम दोस्तों के यहाँ लुट गए
भले आसमाँ पर हुक़ूमत रही
सितारे ज़मीं पर ज़वाँ लुट गए
कई मिट गए दूरियों से यहाँ
कई ज़िस्म के दरमियाँ लुट गए
शज़र काट डाले किसी ने सभी
परिन्दों के सब, आशियाँ लुट गए
0
रात ही रात है दीप जलते नहीं
हम गरीबों के दिन क्यों बदलते नहीं
लग न पाए कभी दाग़ किरदार पर
गिर गए जो नज़र से सँभलते नहीं
किसलिए तुम अचानक ज़ुदा हो गए
इस क़दर ना बिछड़ते तो ख़लते नहीं
रास्ते सब खुले थे तुम्हारे लिए
हद से आगे अग़र तुम निकलते नहीं
तुम न देते दिलाशे हसीं बेख़बर
प्यार में इस क़दर हम मचलते नही
0
बात सच सच सभी को बतानी पड़ेगी
झूठ वालों कि लुटिया डुबानी पड़ेगी
दुश्मनों को हराना अग़र चाहते हो
आपसी रब्त रंजिश मिटानी पड़ेगी
अपने हक़ के लिए ,तुमको लड़ना पड़ेगा
मिलके आवाज़ सबको उठानी पड़ेगी
तेज चलना पड़ेगा ,सफ़र मुसलसल
आँख से आँख, तुमको मिलानी पड़ेगी
बन्द हो जाएगी ,घूस खोरी दलाली
चाटुकारी कि अर्थी उठानी पड़ेगी
0
मँहगाई झेले आबादी
जब हो सत्ता पूँजीवादी
जनता को लड़वाये सियासत
लेकर मसले आये फ़सादी
वादे वादे झूठे वादे
काम न हो, कोई बुनियादी
काट ज़ुबां दी, जिसने बोला
ऐसी कहने की आज़ादी
हिन्दू- मुस्लिम रोज किया है
मुल्क़ में आई तब बर्बादी
0
तरीका इस मुसीबत का सुझाई क्यों नहीं देता
मुझे उम्मीद का मन्ज़र दिखाई क्यों नहीं देता
हुनर ,ज़ालिम ज़माने में बड़ा मोहताज़ रहता है
गुज़ारा कर सकूँ , इतनी कमाई क्यों नहीं देता
रईशों की , दलाली ख़ूब होती है अदालत में
कोई मज़लूम के हक़ में, गवाही क्यों नहीं देता
इशारों पर चलूँ कब तक, तेरी आबाद दुनियाँ में
मुझे तू क़ैद से अपनी रिहाई क्यों नहीं देता
अमीरों की , अमीरी तो मुसलसल बढ़ रही साहब
ख़ुदा कोई ग़रीबों का दिखाई क्यों नहीं देता।
0
हाँथ पैरों में लेकर ये छाले
खोजते फिर रहे हैं निवाले
सच के हक़ में नहीं कोई बोला
लोग मुह पर लगाए हैं ताले
दिन ब दिन बढ़ रहा है अँधेरा
बेच डाले किसी ने उजाले
कर रहे लोग उठने कि कोशिश
कौन गिरते हुए को सँभाले
ख़्वाब जितने निगाहों ने देखे
ज़ख्म उतने ज़िगर ने हैं पाले
अब तो बाज़ार में आ पड़े हैं
कोई बे-मोल हमको उठा ले
आपके प्यार में दिल फ़िदा है
जितना चाहे तू पागल बना ले
रंक ,राजा किसे कब बना दे
खेल उसके बड़े हैं निराले
दर्द की चीख सुनता नहीं तो
कोई कैसे सुने दिल के नाले।
0
बेबसी है भूख की, अब रोटियों में जी रहे
लोग कितने, ज़िन्दगी मजबूरियों में जी रहे
योजना आवास की गुज़री नहीं फुटपाथ से
पर सियासी लोग सारे कोठियों में जी रहे
चाटुकारी झूठ वाले शौहरतों को पा गये
सच के साथी आजकल रुसवाइयों में जी रहे
ख़ूब शोषण हो रहा , भाई भतीजा वाद में
जिसने पर्वत को बनाया, खाइयों में जी रहे
सब क़िताबी आंकड़े , वादे फ़रेबी दे गए
मुल्क़ के मज़दूर सब दुश़्वारियों में जी रहे
भेदभाव कि भावना ने, नफ़रतें बोईं बहुत
आदमीयत छोड़कर सब मज़हबों में जी रहे।
0
बेच देते हैं ईमान धन के लिए
कौन अब जान देगा ,वतन के लिए
बात करने से मसले, कहाँ हल हुए
जंग करनी पड़ेगी ,अमन के लिए
ज़िन्दगी ,चन्द खुशियाँ अता कर मुझे
दर्द दिल में बहुत है सुखन के लिए
उम्र तन्हा गुज़ारी, अँधेरों में खुद
भेजकर रौशनी अंजुमन के लिए
क्या ग़रीबी का आलम बताएं तुम्हें
पास कपड़ा नहीं है क़फ़न के लिए
दूर जब तक न होंगीं ये वीरानियाँ
शेर लिखता रहूँगा चमन के लिए।
0
सजावट का मौसम गुज़र जाएगा
यहीं टूट कर सब बिखर जाएगा
चले तो गये छोड़कर तुम मुझे
न दिल से तुम्हारा असर जाएगा
न कश्ती ,न केवट, न पतवार से
नदी तैर कर, अब हुनर जाएगा
मुक़ाबिल मिलेगा, बराबर का जब
उसी दिन नशा सब उतर जाएगा
भटकते भटकते चले जाएगें
जहाँ तक ये लेकर सफ़र जाएगा
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बढ़ रही हैं मुसलसल बलाएं मेरी
काम आ ना सकीं ,वो दुआएं मेरी
एक ख़्वाहिश तलक़ ना मुक़म्मल हुई
ख़्वाब क्या और देखें निगाहें मेरी
वक़्त अपना बिताकर चला वो गया
रह गईं हाँथ मलतीं वफ़ाएं मेरी
गीत गज़लों के जरिए ,पुकारूँ किसे
कोई सुनता नहीं अब सदाएँ मेरी
मिल रहा है सुकूँ क़ैद में बेख़बर
और कर दो बड़ी अब सजाएं मेरी।
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घूस खोरी चल रही है हर तरफ़ सरकार में
देश की सम्पति बिकेगी अब यहाँ बाजार में
थाना दफ़्तर हर कचहरी, में दलाली चल रही
अब प्रशासन नाचता है नोट की झंकार में
बादलों को बेच डाला ,नीतियों के नाम पर
कौन समझेगा , ग़रीबी जल रही अंगार में
गैस,डीजल,तेल की, क़ीमत मुसलसल बढ़ रही
रोज रुपया लड़खड़ाए वैश्व़िक बाज़ार में
धर्म पर चर्चे करें या बात पाकिस्तान की
रोज़ मंत्री जी मिलेंगे इक़ नए क़िरदार में।
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नेक इरादा कौन करेगा
बोझ ये आधा कौन करेगा
खुशियों थीं तो बात अलग थी
दर्द को साझा कौन करेगा
होगा कोई छोटा मोटा
और दिखावा कौन करेगा
हम दरवारी बन सकते थे
राजा राजा कौन करेगा
झूठों का अब दौर चला है
सच का दावा कौन करेगा।
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रात निकलो कभी आप फुटपाथ पर
लोग सोते मिलें , सर्द फुटपाथ पर
आकड़ो में दिखाया , गया दूसरा
एक भारत बसाया है फुटपाथ पर
रोटियां सब सियासी हवा खा गई
दर्द में भूख जीती है फुटपाथ पर
लोग पीकर चलाने लगे गाड़ियाँ
हादसे रोज होते हैं फुटपाथ पर
लोग महलों में फाँसी , लगाते हैं क्यों
जी रहे ज़िन्दगी लोग फुटपाथ पर।
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ज़िन्दगी की राह पर हर सू अँधेरे हो गए
दान देने वाले ही अब जब लुटेरे हो गए
आप चोरों की तरफ़ थे ,हम डकैतों की तरफ़
इस तरह झगड़े सियासी तेरे-मेरे हो गए
उम्र आधी एक मालिक, उम्र आधी दूसरा
जब हुई बिटिया सयानी सात फेरे हो गए
मुश्किलों में जी रहे, माँ बाप घर में ज़िन्दगी
किस तरह के आजकल बच्चे कमेरे हो। गए
जब तलक़ लिक्खूं नहीं ,मिलता कहाँ आराम है
शाइरी में इस क़दर अपने बसेरे हो गए।
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फ़िर मिली है , रिहाई गुनहगार को
बन्द कर दो , अदालत के बाज़ार को
झूठ सच की , ख़बर छापना छोड़ दी
बस विज्ञापन मिले ,ख़ूब अखबार को
बे-वज़ह इल्म देना ,ग़लत बात है
लोग पागल कहें ,अब समझदार को
हैं जो बेदार ,ढूँढे ज़माना उसे
पूछता है , यहाँ कौन बीमार को
भीड़ देगी नहीं रास्ता बेख़बर
फाँद कर देखिए आप दीवार को।
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हक़ीक़त का कोई पहलू ज़बाबो से नहीं मिलता
हुनर अब ज़िन्दगी का इन किताबों से नहीं मिलता
चले मत रंग पर जाना , कहानी है अलग अपनी
मैं गुड़हल हूँ मेरा लहज़ा गुलाबों से नहीं मिलता
कोई सौदा नहीं है जो , नफा नुकसान देखोगे
मुहब्बत में हसीं मंज़र हिसाबों से नहीं मिलता
न मिलता ओहदा उसको , न उसकी चांदनी होती
कोई भी चाँद ,जब तक,आफ़ताबों से नहीं मिलता
कई पर्दे लिबासों के ,हटाने ज़िस्म से पड़ते
सही किरदार चाहत में ,नकाबों से नहीं मिलता।
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काम हो जाते हैं इशारों से
बच के रहना हसीं नज़ारों से
खौफ़ मझधार का फ़रेबी है
चोंट खाए है हम किनारों से
इस सफ़र का, यही तज़ुर्बा है
पैर छलनी हुए शरारों से
सिर्फ़ अपना ज़बाब दे दो तुम
हमको मतलब नहीं हज़ारों से
पर्वतों को कभी झुकाया था
आज टकरा गए दिवारों से
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बेचने को ज़िस्म अपना भूख अब तैयार है
किस तरह का दौर है हर आदमी लाचार है
झूठ बोलो, जंग छेड़ो , लूट या चोरी करो
नेकियों का काम करना बस यहाँ दुशवार है
एक जैसा ज़िस्म सबका ,एक जैसा खून भी
आदमी के बीच में, इक मज़हबी दीवार है
कश्तियां जाएँ कहाँ, सुनता नहीं कोई ख़ुदा
पार इस मझधार है, उस पार भी मझधार है
कट गए हैं पेड़ जबसे छाँव खोई बेख़बर
फूल वाले रास्तों पर आग है अंगार है।
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फ़रेबी चाल चल चल कर क़यादत खेल खेलेगी
लगाकर आग पानी में , हुक़ूमत खेल खेलेगी
बड़ी बेकार लगती हैं यहाँ इन्साफ की बातें
बड़ी रिशवत मिलेगी तो अदालत खेल खेलेगी
सलीक़े से हज़म करके हमारे मुल्क़ की दौलत
ग़रीबों के निवालों पर ,सियासत खेल खेलेगी
सरे-बाज़ार सड़को पर, तमाशा भूख करती है
के पापी पेट के ख़ातिर , ज़हालत खेल खेलेगी
कभी बिजली गिरेगी तो कभी तूफ़ान आयेंगे
ग़रीबो की गरीबी पर ,क़यामत खेल खेलेगी
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तिरगी को दूर करना रौशनी का फर्ज है
दीप चाहत के जलाना, आदमी का फर्ज है
झील झरनों के सहारे मत रहो बैठे यहाँ
ख़ुद कुआँ अब खोद लेना,तिशनगी का फर्ज है
आता-जाता ही रहेगा , नफ़रतों का दौर पर
ज़िन्दगी को प्यार करना,ज़िन्दगी का फर्ज है
दोस्तों की दोस्ती से ,ज़ख्म पाए पीठ पर
सामने से वार करना दुश्मनी का फर्ज है
वक़्त पर पानी गिराना , बादलों को चाहिए
और हरियाली उगाना, इस ज़मीं का फर्ज है
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उठने लगी हैं आँधियाँ अपना सहारा ढूंढ ले
अब साहिलों के पास जाकर इक किनारा ढूंढ ले
सारे ज़माने की निगाहें चाँद पर हैं आजकल
दिल के मुताबिक़ आसमाँ से तू सितारा ढूंढ ले
आख़िर नज़र को चाहिए मंज़र हसीं दीदार को
अपनी निगाहों के लिए कोई नज़ारा ढूंढ ले
कब तक मुखौटों के सहारे दिन बिताएगा यहाँ
अब ज़िन्दगी के काम का किरदार प्यारा ढूंढ ले
आ जाती हैं कुछ खामियाँ ,ठहरी हुई हर चीज में
अपने सफ़ीनों के लिए, तू बहति- धारा ढूंढ ले
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कई साल देखा समय बे-ख़ुदी का
बड़ी मुश्किलों में मिला पल ख़ुशी का,
अँधेरा घना , हर तरफ़ बढ़ रहा है
दिया बेच किसने दीया रौशनी का
मुसीबत में कुछ अज़नबी काम आए
बहुत था भरोसा तेरी दोस्ती का
ये लगता ख़तरनाक जंगल से ज्यादा
बुरा हो गया है नगर आदमी का
न पानी नदी का, न दरिया समंदर
इलाका बड़ा हैं यहाँ तिशनगी का
गई ज़िन्दगी बीत तन्हा हमारी
मिला ही नहीं साथ मुझको किसी का।
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जब हमारी आँख को आँसू छिपाने आ गए
ज़ख्म पर हमदर्द कुछ मरहम लगाने आ गए
लौटकर जाने लगे अपने शज़र की शाख पर
पंछियों की चोंच में जब चार दाने आ गए
भाग जायेगा अँधेरा , रौशनी के खौफ़ से
ग़र हवाओं में तुम्हें दीपक जलाने आ गए
सीखने का फ़न अचानक ख़ुद ब ख़ुद आ गया
तीर जब थामा निशाने भी लगाने आ गए
दरमियां अब दूरियाँ हैं ,साथ ना छूटा कभी
गीत गज़लों में तुम्हारे ही फ़साने आ गए।
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हाल अक्सर जता नहीं पाए
बात दिल की बता नहीं पाए
वो तो कहने को बस समन्दर थे
आग जलती बुझा नहीं पाए
सात जन्मों की बात करते थे
साथ दो पल निभा नहीं पाए
इश्क़ जलता रहा निग़ाहों में
ख़्वाब तक हम, सज़ा नहीं पाए
ज़िक्र जब आ गया मुहब्बत का
शेर वो गुन-गुना नहीं पाए।
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सारी दुनियाँ जब यहाँ पर रौशनी के साथ है
देखना है कौन शायर बेबसी के साथ है
पार जायेगा वही सैलाब का रुख़ मोड़कर
हौसला जिसके हुनर में ज़िन्दगी के साथ है
शौहरतों की भूख में ,सब हो गए हैं मतलबी
आदमी ही अब कहाँ ,इस आदमी के साथ है
लुट गए कितने मुसाफ़िर, मंज़िलों की राह में
रहबरों का कारवाँ अब रहज़नी के साथ है
हो रही दुनियाँ फ़रेबी ,देख सुन के काम कर
इक नया क़िरदार अब तो, हर किसी के साथ है
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वक़्त बिल्कुल ना बर्बाद किया जाए
काम जो है कल का, आज किया जाए
अपने मसलों को हम ख़ुद ही सुलझा लें
इससे पहले कि हमें बाट दिया जाए
कौन किसको याद रखता है ज़माने भर
और उसको कुछ दिन, याद किया जाए
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सियासत इक छलावा है क़यादत कौन करता है
ग़रीबों की गऱीबी पर इनायत कौन करता है
कमाने के लिए दौलत जरा सा शोर करते हैं
बुराई को मिटाने की बग़ावत कौन करता है
यहाँ कमज़ोर को अपना ,सभी रुतवा दिखाते हैं
हुक़ूमत से जो पूछे कुछ, ये ज़हमत कौन करता है
ज़माना दौड़ता पीछे , अमीरों की सजावट के
किसी मज़लूम के दिल से , मुहब्बत कौन करता है
तेरे रिश्ते मेरे नाते सभी मतलब के साथी हैं
किसी भी ग़ैर के हक में, इबादत कौन करता है
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मिट रही इंसानियत इसको बचा लो बेख़बर
धर्म को पाखण्ड से बाहर निकालो बेख़बर,
आदमी को आदमी का प्यार जो ना दे सके
भेद वाली भावना को फ़ेक डालो बेख़बर,
झूठ कहना झूठ को , तुम आज से कर दो शुरू
सामने सच लाओगे ,ज़िम्मा उठा लो बेख़बर,
जाति वादी ,कौम वाली जो सियासत कर रहे
राजधानी से उन्हें बाहर निकालो बेख़बर,
जो मदत ना कर सके,वो आदमी किस काम के
नेकियों का काम अब ,ना और टालो बेख़बर,
आओ मिलकर जंग छेड़े, इन अँधेरों के विरुद्ध
रौशनी के नाम की , सौगन्ध खालो बेख़बर।
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बोट लेने के ख़ातिर दिखाए गए
मज़हबी मामले फ़िर उठाए गए
योजना तो धरातल पे आई नहीं
आंकड़े सब किताबी सुनाए गए
बढ़ रही है ग़रीबी मुसलसल यहाँ
कैसे वादे सियासी निभाए गए
तीरगी को मिटाने चले लोग जो
आग में घर उन्हीं के जलाए गए
आदमीयत सदा हारती ही रही
नाम लेकर ख़ुदा का लड़ाए गए
नफ़रतों के सिवा ,जब मिला कुछ नहीं
किसलिए ऐसे मज़हब बनाए गए।
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आज यह ख़ुशबू कहाँ से जाफ़रानी आ गई
हादसों की याद हमको फ़िर पुरानी आ गई
ढाई आख़र प्रेम के हर आदमी न पढ़ सका
प्रेम की भाषा किसी को बे-ज़ुबानी आ गई,
ख़ूबियों के साथ हमको ख़ामियाँ आई नज़र
आइनों को देखकर कुछ बद-गुमानी आ गई
देखकर ज़ुल्फ़ें तुम्हारी हो गया मौसम हसीं
आपके आते यहाँ पर, ऋतु सुहानी आ गई
शेर लिखने के अलावा काम कुछ होता नहीं
इश्क़ में बर्बाद होकर ज़िन्दगानी आ गई।
बोझ अपनी ज़िन्दगी का ढो रहा है आदमी
बेसबब की बात पर, करता सियासत रातदिन
बीज नफ़रत के यहाँ,अब बो रहा है आदमी
मस्लहत की भावना,मन में बिठाकर किसलिए
ज़िस्म गंगा में मुसलसल धो रहा है आदमी
चन्द पैसों के लिए ,ये बेच दे ईमान को
नेकियों के रास्तों से खो रहा है आदमी
भूलकर बुनियाद की सारी हक़ीक़त बेख़बर
झूठे-सच्चे ख़्वाब लेकर सो रहा है आदमी
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सच की बेबस बहुत नेकियाँ हैं यहाँ
हर तरफ़ झूठ की सुर्खियाँ हैं यहाँ
लोग तामीर करने लगे तीरगी
दीप कैसे जले आँधियाँ हैं यहाँ
धर्म के नाम पर मत सियासत करो
भूख से जल रहीं बस्तियाँ हैं यहाँ
रोज आती ख़बर अब बल्तकार की
खौफ़ में जी रही बेटियाँ हैं यहाँ
बन गए लोग छोटे , बड़े बेख़बर
एक जैसी सभी रोटियाँ हैं यहाँ।
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चन्द लम्हों के लिए ज़ोखिम उठाकर देखिए
पत्थरों के सामने शीशे लगाकर देखिए
साहिलों से कब तलक़ तकते रहोगे दूर तक
कश्तियाँ अपनी भँवर के बीच लाकर देखिए
उठना-गिरना फिर सँभलना जीस्त का दस्तूर है
मुश्किलों से आप थोड़ा दिल लगाकर देखिए
मील का पत्थर मिलेगा यदि नहीं मंज़िल मिली
रास्तों पर और थोड़ा दूर जाकर देखिए
ख़्वाब देखो फिर नए दुनियाँ पड़ी है सामने
बीत जो लम्हा गया उसको भुलाकर देखिए।
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शहर भर जानता है फ़साने तेरे
एक हम ही नहीं थे दिवाने तेरे
किसलिए बुन रहे हो नई साजिशें
वाक़िये तो बहुत हैं पुराने तेरे
बात सच सच बता दो,है क्या मसअला
अच्छे लगते नहीं अब बहाने तेरे
ठौर कब तक बदलते फिरोगे यहाँ
ढूंढ लेंगे किसी दिन ठिकाने तेरे
उम्रभर ज़ख़्म भरते नहीं बेख़बर
वार करते नज़र के निशाने तेरे
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आओ मिलाएं नज़र से नज़र
ख़ामोशियाँ से ना होगी बसर
ना डूबता फिर सफ़ीना मेरा
पतवार का साथ होता अग़र
छाया हुआ है अँधेरा घना
होगा चराग़ों का कितना असर
यादें तुम्हारी तो जानती
कब नींद आई हमें रातभर
दे दे ख़ुदा अब ठिकाना मुझे
फिरता रहूँ कब तलक दर-बदर
पाई नहीं कोई मंज़िल तो क्या
पा जानते हैं हमारे सफ़र
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फ़ेके सत्ता नें पैसे चार
सबसे पहले बिका अखबार
बनके जनता के सेवक आज
सब नेता करते कारोबार
सत्ता का बस करो गुणगान
गाड़ी बंगला मिलेगी कार
पूंजीपतियों को बिकेगा देश
संसद अब हो गई बाज़ार
जिसके हिस्से में थी बरसात
पाई उसने महज़ बौछार
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कैसे बताएं किस तरह बदनाम हम हुए
उसको जिताते रह गए नाकाम हम हुए
पहले बहुत ये ज़िन्दगी मसरूफ़ थी यहाँ
दिल को लगा के आपसे बेकाम हम हुए
मुझको अकेला छोड़कर क्यों जा रहे हो तुम
सूरज बने तेरे लिए फिर शाम हम हुए
मंज़िल मुझे न मिल सकी ,रस्ते हुए खफ़ा
ऐसे किसी के प्यार में गुमनाम हम हुए
लगती हुई वो बोलियाँ बस देखता रहा
कल फिर उसी बाज़ार में नीलाम हम हुए
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रिश्ता आबाद ,बर्बाद कर लें
आइए आज संवाद कर लें
क़ैद लगने लगे जब मुहब्बत
एक-दूजे को आज़ाद कर लें
तुम किसी और को साद कर लो
हम किसी और को साद कर लें
जान ले लो,मग़र थोड़ा ठहरो
इक दफ़ा हम उसे याद लें
बाद बर्बाद उसको करेंगे
पहले ख़ुद को तो,बर्बाद कर ले
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वो नहीं लौटकर कभी आए
ग़म के मन्ज़र बदल नहीं पाए
प्यास हो और मिल नदी जाए
काश ऐसी कोई घड़ी आए
ज़ख्म खाता रहे ज़िगर कब तक
इक़ मुसीबत अब बड़ी आए
उम्र गुज़री उसी की यादों में
याद तक हम जिसे नहीं आए
साथ कैसे चलें तुम्हारे हम
साथ देने न तुम कभी। आए।
0
नफ़रतों की भावना तुम भर रहे हो किसलिए
दिन ब दिन गन्दी सियासत कर रहे हो किसलिए
देखना है देश को किसकी तरक़्क़ी हो रही
फण्ड कर दो पारदर्शी डर रहे हो किसलिए
दे नहीं सकते सहारा तो हुक़ूमत छोड़ दो
प्राण जनता के यहाँ तुम हर। रहे हो। किसलिए
पहले भी तुमनें किए थे , ना आज़तक पूरे हुए
फ़िर वही वादे फ़रेबी कर रहे हो किसलिए।
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सियासत के चलते यहाँ लुट गए
मुहब्बत के सब कारवाँ लुट गए
दिले - दर्द कैसे सुनाएं तुम्हें
के हम दोस्तों के यहाँ लुट गए
भले आसमाँ पर हुक़ूमत रही
सितारे ज़मीं पर ज़वाँ लुट गए
कई मिट गए दूरियों से यहाँ
कई ज़िस्म के दरमियाँ लुट गए
शज़र काट डाले किसी ने सभी
परिन्दों के सब, आशियाँ लुट गए
0
रात ही रात है दीप जलते नहीं
हम गरीबों के दिन क्यों बदलते नहीं
लग न पाए कभी दाग़ किरदार पर
गिर गए जो नज़र से सँभलते नहीं
किसलिए तुम अचानक ज़ुदा हो गए
इस क़दर ना बिछड़ते तो ख़लते नहीं
रास्ते सब खुले थे तुम्हारे लिए
हद से आगे अग़र तुम निकलते नहीं
तुम न देते दिलाशे हसीं बेख़बर
प्यार में इस क़दर हम मचलते नही
0
बात सच सच सभी को बतानी पड़ेगी
झूठ वालों कि लुटिया डुबानी पड़ेगी
दुश्मनों को हराना अग़र चाहते हो
आपसी रब्त रंजिश मिटानी पड़ेगी
अपने हक़ के लिए ,तुमको लड़ना पड़ेगा
मिलके आवाज़ सबको उठानी पड़ेगी
तेज चलना पड़ेगा ,सफ़र मुसलसल
आँख से आँख, तुमको मिलानी पड़ेगी
बन्द हो जाएगी ,घूस खोरी दलाली
चाटुकारी कि अर्थी उठानी पड़ेगी
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मँहगाई झेले आबादी
जब हो सत्ता पूँजीवादी
जनता को लड़वाये सियासत
लेकर मसले आये फ़सादी
वादे वादे झूठे वादे
काम न हो, कोई बुनियादी
काट ज़ुबां दी, जिसने बोला
ऐसी कहने की आज़ादी
हिन्दू- मुस्लिम रोज किया है
मुल्क़ में आई तब बर्बादी
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तरीका इस मुसीबत का सुझाई क्यों नहीं देता
मुझे उम्मीद का मन्ज़र दिखाई क्यों नहीं देता
हुनर ,ज़ालिम ज़माने में बड़ा मोहताज़ रहता है
गुज़ारा कर सकूँ , इतनी कमाई क्यों नहीं देता
रईशों की , दलाली ख़ूब होती है अदालत में
कोई मज़लूम के हक़ में, गवाही क्यों नहीं देता
इशारों पर चलूँ कब तक, तेरी आबाद दुनियाँ में
मुझे तू क़ैद से अपनी रिहाई क्यों नहीं देता
अमीरों की , अमीरी तो मुसलसल बढ़ रही साहब
ख़ुदा कोई ग़रीबों का दिखाई क्यों नहीं देता।
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हाँथ पैरों में लेकर ये छाले
खोजते फिर रहे हैं निवाले
सच के हक़ में नहीं कोई बोला
लोग मुह पर लगाए हैं ताले
दिन ब दिन बढ़ रहा है अँधेरा
बेच डाले किसी ने उजाले
कर रहे लोग उठने कि कोशिश
कौन गिरते हुए को सँभाले
ख़्वाब जितने निगाहों ने देखे
ज़ख्म उतने ज़िगर ने हैं पाले
अब तो बाज़ार में आ पड़े हैं
कोई बे-मोल हमको उठा ले
आपके प्यार में दिल फ़िदा है
जितना चाहे तू पागल बना ले
रंक ,राजा किसे कब बना दे
खेल उसके बड़े हैं निराले
दर्द की चीख सुनता नहीं तो
कोई कैसे सुने दिल के नाले।
0
बेबसी है भूख की, अब रोटियों में जी रहे
लोग कितने, ज़िन्दगी मजबूरियों में जी रहे
योजना आवास की गुज़री नहीं फुटपाथ से
पर सियासी लोग सारे कोठियों में जी रहे
चाटुकारी झूठ वाले शौहरतों को पा गये
सच के साथी आजकल रुसवाइयों में जी रहे
ख़ूब शोषण हो रहा , भाई भतीजा वाद में
जिसने पर्वत को बनाया, खाइयों में जी रहे
सब क़िताबी आंकड़े , वादे फ़रेबी दे गए
मुल्क़ के मज़दूर सब दुश़्वारियों में जी रहे
भेदभाव कि भावना ने, नफ़रतें बोईं बहुत
आदमीयत छोड़कर सब मज़हबों में जी रहे।
0
बेच देते हैं ईमान धन के लिए
कौन अब जान देगा ,वतन के लिए
बात करने से मसले, कहाँ हल हुए
जंग करनी पड़ेगी ,अमन के लिए
ज़िन्दगी ,चन्द खुशियाँ अता कर मुझे
दर्द दिल में बहुत है सुखन के लिए
उम्र तन्हा गुज़ारी, अँधेरों में खुद
भेजकर रौशनी अंजुमन के लिए
क्या ग़रीबी का आलम बताएं तुम्हें
पास कपड़ा नहीं है क़फ़न के लिए
दूर जब तक न होंगीं ये वीरानियाँ
शेर लिखता रहूँगा चमन के लिए।
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सजावट का मौसम गुज़र जाएगा
यहीं टूट कर सब बिखर जाएगा
चले तो गये छोड़कर तुम मुझे
न दिल से तुम्हारा असर जाएगा
न कश्ती ,न केवट, न पतवार से
नदी तैर कर, अब हुनर जाएगा
मुक़ाबिल मिलेगा, बराबर का जब
उसी दिन नशा सब उतर जाएगा
भटकते भटकते चले जाएगें
जहाँ तक ये लेकर सफ़र जाएगा
0
बढ़ रही हैं मुसलसल बलाएं मेरी
काम आ ना सकीं ,वो दुआएं मेरी
एक ख़्वाहिश तलक़ ना मुक़म्मल हुई
ख़्वाब क्या और देखें निगाहें मेरी
वक़्त अपना बिताकर चला वो गया
रह गईं हाँथ मलतीं वफ़ाएं मेरी
गीत गज़लों के जरिए ,पुकारूँ किसे
कोई सुनता नहीं अब सदाएँ मेरी
मिल रहा है सुकूँ क़ैद में बेख़बर
और कर दो बड़ी अब सजाएं मेरी।
0
घूस खोरी चल रही है हर तरफ़ सरकार में
देश की सम्पति बिकेगी अब यहाँ बाजार में
थाना दफ़्तर हर कचहरी, में दलाली चल रही
अब प्रशासन नाचता है नोट की झंकार में
बादलों को बेच डाला ,नीतियों के नाम पर
कौन समझेगा , ग़रीबी जल रही अंगार में
गैस,डीजल,तेल की, क़ीमत मुसलसल बढ़ रही
रोज रुपया लड़खड़ाए वैश्व़िक बाज़ार में
धर्म पर चर्चे करें या बात पाकिस्तान की
रोज़ मंत्री जी मिलेंगे इक़ नए क़िरदार में।
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नेक इरादा कौन करेगा
बोझ ये आधा कौन करेगा
खुशियों थीं तो बात अलग थी
दर्द को साझा कौन करेगा
होगा कोई छोटा मोटा
और दिखावा कौन करेगा
हम दरवारी बन सकते थे
राजा राजा कौन करेगा
झूठों का अब दौर चला है
सच का दावा कौन करेगा।
0
रात निकलो कभी आप फुटपाथ पर
लोग सोते मिलें , सर्द फुटपाथ पर
आकड़ो में दिखाया , गया दूसरा
एक भारत बसाया है फुटपाथ पर
रोटियां सब सियासी हवा खा गई
दर्द में भूख जीती है फुटपाथ पर
लोग पीकर चलाने लगे गाड़ियाँ
हादसे रोज होते हैं फुटपाथ पर
लोग महलों में फाँसी , लगाते हैं क्यों
जी रहे ज़िन्दगी लोग फुटपाथ पर।
0
ज़िन्दगी की राह पर हर सू अँधेरे हो गए
दान देने वाले ही अब जब लुटेरे हो गए
आप चोरों की तरफ़ थे ,हम डकैतों की तरफ़
इस तरह झगड़े सियासी तेरे-मेरे हो गए
उम्र आधी एक मालिक, उम्र आधी दूसरा
जब हुई बिटिया सयानी सात फेरे हो गए
मुश्किलों में जी रहे, माँ बाप घर में ज़िन्दगी
किस तरह के आजकल बच्चे कमेरे हो। गए
जब तलक़ लिक्खूं नहीं ,मिलता कहाँ आराम है
शाइरी में इस क़दर अपने बसेरे हो गए।
0
फ़िर मिली है , रिहाई गुनहगार को
बन्द कर दो , अदालत के बाज़ार को
झूठ सच की , ख़बर छापना छोड़ दी
बस विज्ञापन मिले ,ख़ूब अखबार को
बे-वज़ह इल्म देना ,ग़लत बात है
लोग पागल कहें ,अब समझदार को
हैं जो बेदार ,ढूँढे ज़माना उसे
पूछता है , यहाँ कौन बीमार को
भीड़ देगी नहीं रास्ता बेख़बर
फाँद कर देखिए आप दीवार को।
0
हक़ीक़त का कोई पहलू ज़बाबो से नहीं मिलता
हुनर अब ज़िन्दगी का इन किताबों से नहीं मिलता
चले मत रंग पर जाना , कहानी है अलग अपनी
मैं गुड़हल हूँ मेरा लहज़ा गुलाबों से नहीं मिलता
कोई सौदा नहीं है जो , नफा नुकसान देखोगे
मुहब्बत में हसीं मंज़र हिसाबों से नहीं मिलता
न मिलता ओहदा उसको , न उसकी चांदनी होती
कोई भी चाँद ,जब तक,आफ़ताबों से नहीं मिलता
कई पर्दे लिबासों के ,हटाने ज़िस्म से पड़ते
सही किरदार चाहत में ,नकाबों से नहीं मिलता।
0
काम हो जाते हैं इशारों से
बच के रहना हसीं नज़ारों से
खौफ़ मझधार का फ़रेबी है
चोंट खाए है हम किनारों से
इस सफ़र का, यही तज़ुर्बा है
पैर छलनी हुए शरारों से
सिर्फ़ अपना ज़बाब दे दो तुम
हमको मतलब नहीं हज़ारों से
पर्वतों को कभी झुकाया था
आज टकरा गए दिवारों से
0
बेचने को ज़िस्म अपना भूख अब तैयार है
किस तरह का दौर है हर आदमी लाचार है
झूठ बोलो, जंग छेड़ो , लूट या चोरी करो
नेकियों का काम करना बस यहाँ दुशवार है
एक जैसा ज़िस्म सबका ,एक जैसा खून भी
आदमी के बीच में, इक मज़हबी दीवार है
कश्तियां जाएँ कहाँ, सुनता नहीं कोई ख़ुदा
पार इस मझधार है, उस पार भी मझधार है
कट गए हैं पेड़ जबसे छाँव खोई बेख़बर
फूल वाले रास्तों पर आग है अंगार है।
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फ़रेबी चाल चल चल कर क़यादत खेल खेलेगी
लगाकर आग पानी में , हुक़ूमत खेल खेलेगी
बड़ी बेकार लगती हैं यहाँ इन्साफ की बातें
बड़ी रिशवत मिलेगी तो अदालत खेल खेलेगी
सलीक़े से हज़म करके हमारे मुल्क़ की दौलत
ग़रीबों के निवालों पर ,सियासत खेल खेलेगी
सरे-बाज़ार सड़को पर, तमाशा भूख करती है
के पापी पेट के ख़ातिर , ज़हालत खेल खेलेगी
कभी बिजली गिरेगी तो कभी तूफ़ान आयेंगे
ग़रीबो की गरीबी पर ,क़यामत खेल खेलेगी
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तिरगी को दूर करना रौशनी का फर्ज है
दीप चाहत के जलाना, आदमी का फर्ज है
झील झरनों के सहारे मत रहो बैठे यहाँ
ख़ुद कुआँ अब खोद लेना,तिशनगी का फर्ज है
आता-जाता ही रहेगा , नफ़रतों का दौर पर
ज़िन्दगी को प्यार करना,ज़िन्दगी का फर्ज है
दोस्तों की दोस्ती से ,ज़ख्म पाए पीठ पर
सामने से वार करना दुश्मनी का फर्ज है
वक़्त पर पानी गिराना , बादलों को चाहिए
और हरियाली उगाना, इस ज़मीं का फर्ज है
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उठने लगी हैं आँधियाँ अपना सहारा ढूंढ ले
अब साहिलों के पास जाकर इक किनारा ढूंढ ले
सारे ज़माने की निगाहें चाँद पर हैं आजकल
दिल के मुताबिक़ आसमाँ से तू सितारा ढूंढ ले
आख़िर नज़र को चाहिए मंज़र हसीं दीदार को
अपनी निगाहों के लिए कोई नज़ारा ढूंढ ले
कब तक मुखौटों के सहारे दिन बिताएगा यहाँ
अब ज़िन्दगी के काम का किरदार प्यारा ढूंढ ले
आ जाती हैं कुछ खामियाँ ,ठहरी हुई हर चीज में
अपने सफ़ीनों के लिए, तू बहति- धारा ढूंढ ले
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कई साल देखा समय बे-ख़ुदी का
बड़ी मुश्किलों में मिला पल ख़ुशी का,
अँधेरा घना , हर तरफ़ बढ़ रहा है
दिया बेच किसने दीया रौशनी का
मुसीबत में कुछ अज़नबी काम आए
बहुत था भरोसा तेरी दोस्ती का
ये लगता ख़तरनाक जंगल से ज्यादा
बुरा हो गया है नगर आदमी का
न पानी नदी का, न दरिया समंदर
इलाका बड़ा हैं यहाँ तिशनगी का
गई ज़िन्दगी बीत तन्हा हमारी
मिला ही नहीं साथ मुझको किसी का।
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जब हमारी आँख को आँसू छिपाने आ गए
ज़ख्म पर हमदर्द कुछ मरहम लगाने आ गए
लौटकर जाने लगे अपने शज़र की शाख पर
पंछियों की चोंच में जब चार दाने आ गए
भाग जायेगा अँधेरा , रौशनी के खौफ़ से
ग़र हवाओं में तुम्हें दीपक जलाने आ गए
सीखने का फ़न अचानक ख़ुद ब ख़ुद आ गया
तीर जब थामा निशाने भी लगाने आ गए
दरमियां अब दूरियाँ हैं ,साथ ना छूटा कभी
गीत गज़लों में तुम्हारे ही फ़साने आ गए।
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हाल अक्सर जता नहीं पाए
बात दिल की बता नहीं पाए
वो तो कहने को बस समन्दर थे
आग जलती बुझा नहीं पाए
सात जन्मों की बात करते थे
साथ दो पल निभा नहीं पाए
इश्क़ जलता रहा निग़ाहों में
ख़्वाब तक हम, सज़ा नहीं पाए
ज़िक्र जब आ गया मुहब्बत का
शेर वो गुन-गुना नहीं पाए।
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सारी दुनियाँ जब यहाँ पर रौशनी के साथ है
देखना है कौन शायर बेबसी के साथ है
पार जायेगा वही सैलाब का रुख़ मोड़कर
हौसला जिसके हुनर में ज़िन्दगी के साथ है
शौहरतों की भूख में ,सब हो गए हैं मतलबी
आदमी ही अब कहाँ ,इस आदमी के साथ है
लुट गए कितने मुसाफ़िर, मंज़िलों की राह में
रहबरों का कारवाँ अब रहज़नी के साथ है
हो रही दुनियाँ फ़रेबी ,देख सुन के काम कर
इक नया क़िरदार अब तो, हर किसी के साथ है
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वक़्त बिल्कुल ना बर्बाद किया जाए
काम जो है कल का, आज किया जाए
अपने मसलों को हम ख़ुद ही सुलझा लें
इससे पहले कि हमें बाट दिया जाए
कौन किसको याद रखता है ज़माने भर
और उसको कुछ दिन, याद किया जाए
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सियासत इक छलावा है क़यादत कौन करता है
ग़रीबों की गऱीबी पर इनायत कौन करता है
कमाने के लिए दौलत जरा सा शोर करते हैं
बुराई को मिटाने की बग़ावत कौन करता है
यहाँ कमज़ोर को अपना ,सभी रुतवा दिखाते हैं
हुक़ूमत से जो पूछे कुछ, ये ज़हमत कौन करता है
ज़माना दौड़ता पीछे , अमीरों की सजावट के
किसी मज़लूम के दिल से , मुहब्बत कौन करता है
तेरे रिश्ते मेरे नाते सभी मतलब के साथी हैं
किसी भी ग़ैर के हक में, इबादत कौन करता है
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मिट रही इंसानियत इसको बचा लो बेख़बर
धर्म को पाखण्ड से बाहर निकालो बेख़बर,
आदमी को आदमी का प्यार जो ना दे सके
भेद वाली भावना को फ़ेक डालो बेख़बर,
झूठ कहना झूठ को , तुम आज से कर दो शुरू
सामने सच लाओगे ,ज़िम्मा उठा लो बेख़बर,
जाति वादी ,कौम वाली जो सियासत कर रहे
राजधानी से उन्हें बाहर निकालो बेख़बर,
जो मदत ना कर सके,वो आदमी किस काम के
नेकियों का काम अब ,ना और टालो बेख़बर,
आओ मिलकर जंग छेड़े, इन अँधेरों के विरुद्ध
रौशनी के नाम की , सौगन्ध खालो बेख़बर।
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बोट लेने के ख़ातिर दिखाए गए
मज़हबी मामले फ़िर उठाए गए
योजना तो धरातल पे आई नहीं
आंकड़े सब किताबी सुनाए गए
बढ़ रही है ग़रीबी मुसलसल यहाँ
कैसे वादे सियासी निभाए गए
तीरगी को मिटाने चले लोग जो
आग में घर उन्हीं के जलाए गए
आदमीयत सदा हारती ही रही
नाम लेकर ख़ुदा का लड़ाए गए
नफ़रतों के सिवा ,जब मिला कुछ नहीं
किसलिए ऐसे मज़हब बनाए गए।
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आज यह ख़ुशबू कहाँ से जाफ़रानी आ गई
हादसों की याद हमको फ़िर पुरानी आ गई
ढाई आख़र प्रेम के हर आदमी न पढ़ सका
प्रेम की भाषा किसी को बे-ज़ुबानी आ गई,
ख़ूबियों के साथ हमको ख़ामियाँ आई नज़र
आइनों को देखकर कुछ बद-गुमानी आ गई
देखकर ज़ुल्फ़ें तुम्हारी हो गया मौसम हसीं
आपके आते यहाँ पर, ऋतु सुहानी आ गई
शेर लिखने के अलावा काम कुछ होता नहीं
इश्क़ में बर्बाद होकर ज़िन्दगानी आ गई।