गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

गीत संग्रह ,कवि वैभव बेखबर कानपूर



अब   हुस्न   मुहब्बत के  नाम  से
इस  दिल  ने  धड़कना छोड़ दिया

कतरा  कतरा    बहते  रहना   ख़्वाबों की  दुनियां में  रहना
आधी  आधी  रात  तुम्हारी   यादों   में   जगना  छोड़  दिया
अब  हुस्न   मुहब्बत  के  नाम से .....

रूठे   पल  पल  कौन   मनाए    लाखों  नख़रे   कौन  उठाए
अब   मीठी-मीठी  बातों  पे  तन मन  ने  बहकना छोड़ दिया
अब  हुस्न  मुहब्बत  के नाम से......

ज़न्नत  में  हूरें   रहती   हो    तो    दोज़ख़    जाना   चाहूँ   मैं
जिस ओर हँसीना ए बस्ती हो उस ओर  निकलना छोड़ दिया
अब हुस्न  मुहब्बत के नाम से इस दिल ने धड़कना छोड़ दिया

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जाति  से   कोई   होता  न  छोटा - बड़ा
नौजवानों     उठो    ये  भरम   तोड़  दो

चक्रव्यूह    में    फ़साते   हैं    पैसे  यहाँ
आदमी    तो   सभी    एक   जैसे  यहाँ
नेकियों  का  जलाओ  अलक  साथियों
एक   दूजे   की  करके   मदत  साथियों
इस  तरह  रब  की  पूजा  करें आज हम
आओ  मिलकर  बदी  से लड़ें आज हम
राह-ए-इंसानियत   पर   बढ़ाओ   कदम
धर्म  के  नाम  पर  ना हो   ज़ुल्मों-सितम,
फूल    पाती     चढ़ाने   से   होगा    भला
नौजवानों     उठो  ये   भरम    तोड़   दो  

सामने   झूठ   की     एक    मझधार   है
ज़िन्दगी   की   मुसीबत   में   पतवार  है
खा   रहा  है  यहाँ   भोग   छप्पन   कोई
रोटियों    के    लिए    कोई    लाचार  है
मैल    मन  में    भरे     बैर   इन्सान  को
अब   टटोलो     सियासत  के  ईमान को
पाप  बढ़ने   न  दोगे  ये   खा  लो  कसम
उसको  वैसा  मिले   जिसके  जैसे  करम,
सब    मुक़द्दर  में   आता  है  लिक्खा हुआ
नौजवानों    उठो    ये   भरम     तोड़    दो


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ये   चार  दिनों   का   जीवन  है
दो पल की खुशियाँ, बाकी ग़म

पथ में   काटें भी  मिलते  हैं
पर  चलने   वाले   चलते  हैं
कुछ खोने को ,कुछ पाने को
गुल  खिलते  हैं  मुरझाने को,
ठोकर  पर   ठोकर  खाते  हैं
कुछ घावों को मिलता मरहम

हरियाली   को   सावन  तरसे
ऐसे   भी    ना  बादल    बरसे
जो हद से ज़्यादा तप जाती है
वो माटी ,मरुथल बन जाती है,
इक भोर से लेकर साँझ तलक
 अब  रंग  कई   बदले  मौसम।


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भूल   गए  बागों   का   रस्ता
मनमोहक  कलियाँ याद रहीं

सब के  सब  जाने  पहचाने
साथी , बूढ़े , बच्चे   गाँव  में
घूँघट  में    चाँद  रहा  करते
पायल पहने महावर पाँव में,
चौपालों   की   चर्चा   थोड़ी
बस्ती कुछ  गलियाँ याद रहीं

कुछ कच्चे घर,कुछ छप्पर के
टिप  टिप  रिसते बरसातों  में
मिल  बैठ के   तापा  करते थे
हम   सर्दी    वाली    रातों  में,
नहरें,  पगडण्डी    खेतों   की
मटरों   की   फलियाँ  याद रहीं



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बोझ  पड़ा    ज़िम्मेदारी  का
दरपन   मुस्काना   भूल  गए

बैर किसी से, किसी से यारी
करनी   होगी    दुनियाँ दारी
झूठी  , सच्ची    खातिरदारी
लोग  मिलेंगे  सब  किरदारी,
अब डिजिटल हैं सारे सम्बन्ध
घर   आना  जाना   भूल  गए।

हर  मुश्किल  से  लड़ते  जाओ
गिर  गिर  उठकर  बढ़ते जाओ
विपदाओं  का   पथ  है  जीवन
साँस है  जब तक चलते  जाओ,
भटकाया     इतना     राहों   ने
अपना  ठौर-ठिकाना  भूल  गए।




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आदमी आज  सड़को  पे  लाचार  है
कोई  मजबूर  है    कोई    बीमार  है
भूख  का   दर्द    सीने  में   अंगार  है
रहज़नी   फ़ितरतें, मज़हबी   नफ़रतें
लोग   ऐसी    तरक़्क़ी    नहीं  चाहते।

दिन-ब-दिन  ज़ुर्म बढ़ता, न रोके कोई
झूठ   पर  झूठ   बोले , न  टोके  कोई
कर  रहा  है  बसर   बोझ   ढोके  कोई
क़ुर्बतों    की  ज़गह  मिल रहीं  फुरकतें
लोग    ऐसी     तरक़्क़ी    नहीं   चाहते।

वहशी   फिरते  यहाँ,  नेक किरदार में
क़त्ल  होते     सरेआम    बाज़ार   में
झूठ   छपने   लगा  आज अखबार में
रौशनी   की  ज़गह   ज़ुल्मतें  ज़ुल्मतें
लोग   ऐसी    तरक़्क़ी   नहीं    चाहते।

धूप   से   ये ज़मीं   जल  रही  बेख़बर
इक  भयानक   हवा चल  रही बेख़बर
हर  कली  खौफ़ में  खिल रही बेख़बर
प्यास   के  नाम पर, आतिशी  बरकतें
लोग   ऐसी     तरक़्क़ी    नहीं   चाहते।




1

गुलशन का गुल क्यों  ख़ार लगे
हर  शबनम   भी   अंगार  लगे
हर मुश्किल  इसमें  दुनियां की
क्यों  अच्छा फ़िर भी प्यार लगे

आवे   रूह   सुख़न ,तन मन में
लागे ,प्रीत  लगन  जब दिल में
देह   हुई    जब    चन्दन   कोई
रोक   पावे    बन्धन   कोई
इश्क़ में ,अक्सर  हर कश्ती को
साहिल ,पर ही   मझधार मिले
क्यों अच्छा फिर भी  प्यार लगे

है    दुनियां  से  अनजान  नहीं
पर  दुनियां को  पहचान  नहीं
ग़म  और  ख़ुशी की   रंगत  है
इश्क़  ही  धरा   पर  जन्नत  है
है ख़्वाहिश, दिल को जीने की
पर   जीना  इसमें  दुशवार लगे
क्यों अच्छा फ़िर भी प्यार  लगे।

2

चित   अपरचित  रहा   प्रेम  के   भाव  से
गीत  को , मीत    कोई    मिला  ही   नहीं।

डोर  दिल  में  बंधीं   सांस  से  सांस  की
सूखती   जा   रही  हैनदी    आस  की
आसुओं   में   गये डूब    सारे    सपन
क्या  बतायें   किसे  ,वेदना     प्यास  की

तीरगी   में    भटकते    रहे  ,  हम    सदा
दीप   कोई     हिया   में,   जला   ही  नहीं

ख़्वाब  आते    रहे  , ख़्वाब   जाते    रहे
नींद     आंखों    से    मेरी    चुराते   रहे
प्राण  को, जब  हक़ीक़त  भयानक लगी
दिल  को   किस्से  ,किताबी  सुनाते  रहे,

पीर   दिल  की   सदा , मौन   साधे    रही
कंठ   का   तार   कोई,   हिला   ही   नहीं।


3

:          भावोंका    अनुवाद  करूँ,    जब खुद  से  संवाद  करूँ

          जो उलझा है,कुछ सुलझा है..... ये जीवन  वो  धागा  है
          कौशल ही निर्णय करता है.., भाग्यवान कौन अभागा है

          गोचर को साधक समझा अब, कल्पित को आज़ाद करूँ
          भावों  का   अनुवाद करूँ,      जब  खुद  से  संवाद करूँ

          ये किन्चित कितना जीवन है, कितनी इच्छायें   उर  में हैं
          नभ, पँछी  उतना  नापेगा,   जितनी  क्षमतायें   पर  में हैं

          याद नहीं  है  सीधी  फ़िर भी, उल्टी गिनती  मैं याद करूँ
           भावों  का   अनुवाद    करूँजब  खुद से   संवाद करूँ।
                                           वैभव बेख़बर
4

: तुम  भूल गए  ना  भूले  हम
स्मृतियों में अक्सर झूले हम
तेरी  प्रीत संग जो बीत गया
है  लम्हा लम्हा  मुझको याद

जल अंखियों से बह जाता है
कंठ  सूख सूख  रह जाता है
जैसे आया पतझर उपवन में
अवसाद भरा  है  तन मन में,

वियोग में अनुराग ,करे उन्माद
प्रिय संयोग अपना था अपवाद

कितनी  अभागी  यह धरती है
लौट गए  बादल   बिन  बरसे
एकबार  समाधि पर आ जाना
प्रिय मिलने को ,जियरा  तरसे,

जब एकान्त करे,विरह संवाद
तुम्हें  सोंच सोंच, पियूँ विसाद

5

छाया   इतनी  सूरज पर , चारों  ओर   अँधेरा  है
काली  काली   रातों को   कहते  लोग  सवेरा  है

हाल  न  पूछ  ग़रीबों का, पग पग पर लाचारी है
मरना भी  आसान कहाँ , जीने   में   दुशवारी  है
पहचान  नहीं   पाओगे  , दाता   कौन  लुटेरा  है

ज़ुल्म  सियासी  जारी है , ईंटों पर   बुनियाद की
अक्सर  आती   जाती  हैं, सरकारें  पूजींवाद की
मज़लूमो   की  बस्ती  को,  साहूकार  ने  घेरा  है

लेकर  कश्ती  आये  थे, पहले  हम  मझधारो में
तब  जाकर चलना आया, बहती उल्टी  धारों  में
बाज़ारू  हर  मंज़िल  है, चटुकारों   का  डेरा  है।


6

हुआ   मतलबी,   बेरहम   अब  ज़माना
समझ  सोंचकर  आप  दिल को लगाना

सुनों   दास्ताँ  ,  आसमाँ    के  सितारों
मुहब्बत  ने   हमको  दिए  ग़म  हज़ारों
सितम  भी  सनम  ने  सलीके  से  ढाए
भुलाना  जो   चाहा  बहुत   याद  आये,
नज़र  हर  किसी से   न यूँ ही   मिलाना

मुहब्बत में  हद  से   गुज़रना  नहीं तुम
हमारी    तरह से    बिखरना  नहीं  तुम
सताया   बहुत   है   ज़माने   ने  हमको
हमीं   जल   गए  थे, बुझाने  में  उनको,
ज़रा सीख  ले, हाल  दिल का  छिपाना

किए   पाँव  ज़ख्मी    बहुत   रास्तों  नें
बिछाए  थे      काँटे    कई    दोस्तों  नें
मुहब्बत   में  दिल  की  कहानी  अधूरी
लिए     फ़िर    रहा  हूँ   ज़वानी  अधूरी,
नहीं   छोड़ता    इश्क़   कोई    ठिकाना


7


एक   मज़दूर   हैं    बद-नसीबी   में  हम
ज़िन्दगी    जी   रहे   हैं    ग़रीबी  में  हम

लोग   ऊँचे       उठाते     मेरा    फ़ायदा
ना   हुक़ूमत   का  मिलता  सहारा  यहाँ
भूख   की     बेबसी   रोज  तड़पाती  है
बोझ    ढोकर   करूँ   मैं   गुज़ारा   यहाँ

डॉक्टरों      की     लुटाई    सरेआम   है
मर्ज़   के  साथ   पलते   शरीरी   में  हम

लाभ  मिलता  नहीं    योजना  का  हमें
और   सरपँच   आँखे   दिखाता   बहुत
दफ़्तरों   में   दलाली  का   धंधा    चले 
भ्रष्ट    शासन  ये हमको   सताता  बहुत

कैसे   महँगाई   में   अपने    बच्चे   पढें
आ   गए   रोटियों   कि  फ़कीरी  में हम

8

प्यास में  मुरझा  गए  हैं  पेड़   सारे
जाने कब इस बाग में बरसात होगी

अगले मौसम का सहारा कर रहे हैं
जैसे-तैसे  हम  गुज़ारा   कर  रहे हैं
फूल-पत्तों  की  लड़ाई  थी हवा  से
हमसें बादल क्यों किनारा कर रहे हैं,
आसमाँ की छाँव  कुछ आराम देती
हम प्रतीक्षा  कर रहे  कब रात होगी।
प्यास में मुरझा गए हैं...............

धूप नें झुलसा दिया है तन-बदन को
पेंड़  छोटे  खो  चुके  हैं  बाँकपन को
भेज  दे  सँदेश  कोई  यह  गगन को
प्राण  तक  तैयार हैं  हर आचमन को,
कोना-कोना हो चुका बंज़र ज़मीं का
बारिसों की  जाने कब  सौगात  होगी।
प्यास  में  मुरझा  गए हैं...............

9

आदमी    उतरा   मुनाफ़ा    खोजने   व्यापार  में
सभ्यता   गिरवी  पड़ी  है   आधुनिक  बाज़ार  में

चाटुकारी  का   ज़माना  चल  रहा  है  आजकल
एक-दूजे   को   ज़माना  छल  रहा  है  आजकल,
धर्म  को  मसला बनाया, तो  कहीं  पर  जात को
कोई  ना  समझे  यहाँ   इन्सानियत  ज़ज़्बात को,
एक  सूरत  ढल  रही  है,  बीस   दस  किरदार   में
सभ्यता   गिरवी   पड़ी  है   आधुनिक बाज़ार  में।

पूँजीपतियों  की  यहाँ,  अपनी  अलग  पहचान है
भूख  से  बेबस   बहुत ,  मज़लूम   हिन्दोस्तान  है,
बद-से-बदतर   देश  की  हालत, ज़हालत हो रही
और  सच  के  नाम  पर  ,गन्दी  सियासत हो  रही,
है  नहीं    कोई   किसी   का , मतलबी  संसार  में
सभ्यता   गिरवी   पड़ी  है   आधुनिक  बाजार में।

संस्कारी   प्रेम    वाला   आचरण    दिखता  नहीं
अब तो बच्चों  में  हया  का आवरण दिखता नहीं,
उठती  है   दीवार  जिस पर  खोखली बुनियाद है
मुस्कराहट   है    सजावट ,  आदमी    नाशाद   है,
आज  दरिया   नेकियों  का,  जल  रहा  अंगार  में
सभ्यता   गिरवी  पड़ी  है  ,आधुनिक   बाज़ार  में।















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